प्रस्तावना
भारत में अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए अग्रेज उपनिवेशवादियों के विभिन्न तरीको के बारे में हम पिछले अध्याय में पढ़ चुके है। अब इस अध्याय में हम भारत की पारम्परिक अर्थव्यवस्था के औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में बदलने पर चर्चा करेगे। 17वीं शताब्दी में, भारत के एशियाई देशों के साथ फलता-फूलता व्यापार था general knowledge in indian history।
एशियाई देश, अरब से चीन तक और अफ्रीका के पूर्वी तट पर बसे देशों के साथ भारत के व्यापारिक रिश्तों से देश के उद्योगों और कृषि दोनों को फायदा मिला। साथ ही, देश के अन्दर विभिन्न प्रान्तों के बीच समृद्ध व्याधार भी भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू था।

लेकिन मारत का यह जीवन्त व्यापार औरंगजेब के शासन के अन्तिम दिनों में सिमटने लगा। इसका कारण, दक्षिण में औरंगजेब के लम्बे समय तक युद्धरत और कमजोर शाही प्रशासन के चलते देश में व्याप्त अराजकता थी।
औरंगजेब की मौत के बाद जो हालात बने, वे निरन्तर उत्पादन और व्यापारिक वस्तुओं को वितरण के लिए अनुकूल नहीं थे और इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का लगा। देश में राजनीतिक स्थिरता नहीं रही और विद्रोहों तथा युद्धों ने इसे अस्त-व्यस्त कर दिया था general knowledge in indian history in hindi।
फलता-फूलता व्यापार, स्थानीय राजाओं और छोटे-मोटे सरदारों द्वारा बसूले जाने वाले आयात शुल्कों से थम गया था। ऐसे समय में पश्चिमी देशों ने इस व्यवस्था-विहीन स्थिति का भरपूर लाभ उठाया। मुगल प्रशासन ने अपनी समुद्धी सेना (नौसेना) रखने के प्रति लापरवाही बरती। हिन्द महासागर में यूरोपीय छिछोरों की पैठ बनने का यह एक बड़ा कारण था।
अतः, पतनशील व्यापारिक नौशक्ति की वजह से दक्षिण पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया और आहीका में भारत को अपने प्राचीन और पारम्परिक बाजारों से हाथ धोना पड़ा। प्लासी और बक्सर के युद्ध भारत के पारम्परिक व्यापार और कृषि के लिए ताबूत में आखिरी कील साबित हुए।
अंग्रेजों ने अवध के26नवाब पर अपनी अहम जीत के बाद बगाल के समृद्ध प्रान्तों पर अपनी पकड़ बनाने में देरी नहीं की। बंगाल के प्रशासन पर अंग्रेजों के वर्चश्य से, आत्मनिर्भर और मांग से अधिक वाली भारतीय अर्थव्यवस्था औपनिवेशिक अर्थ व्यवस्था में तब्दील होने लगी general knowledge in indian history।
उद्देश्य भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की आर्थिक विस्तार का अध्ययन करना।भारतीय व्यापार और उद्योग में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिएउपनिवेशवादियों द्वारा अपनाए गए अनेक तौर-तरीकों को नली-भांति समझना।
भारतीय सम्पदा की लूट के लिए अंग्रेजों द्वारा अपनाई गई भू-राजस्य नीतियों का समझानाग्रामीण ऋणग्रस्ता”, गरीबी में बढ़ोतरी और भारतीय फसलों के वाणिज्यीकरणकी जांच करना।”सम्पदा पलायन” की अवधारणा का अध्ययन करना।भारतीय हस्तकला के पतन का अध्ययन करना।
भारतीय अर्थव्यवस्था का औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में बदलना1757 से 1947 तक, अंग्रेजों ने अपनी व्यापारिक सुविधाएं बढ़ाने और भारत के आर्थिक संसाधनों का दोहन करने के लिए अनेक प्रकार की आर्थिक नीतियों अपनायीं general knowledge in indian history।
माक्संवादी विद्वान और बोली विशेषज्ञ आत्मी० दल के अनुसार, औपनिवेशिक सरकार ने भारत के आर्थिक संसाधनों का तीन अलग-अलग घरणों में दोहन किया। अपनी चिरस्थाची कृति “इंडिया टुडे में उन्होंने पहले बरण को तिजारती चरण (1757-1813) कहा है।
दत्त का तर्क है कि इसमें कम्पनी ने व्यापार पर एकाधिकार जमाया और बंगाल के दस्तकारों पर धौत जमाकर उन्हें अपने उत्पाद सस्ती कीमतों पर बेचने के लिए मजबूर किया। दत्त ने 1813-1857 की अवधि को दूसरा चरण कहा है। दोहन के इस दूसरे चरण के दौरान, भारत ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चा माल निर्यात करने वाला प्रमुख देश और ब्रिटेन में बनी दस्तुओं के लिए एक मुख्य बाजार बना।
इस चरण में भारत में बने उत्पादों को इग्लेष्ठ में बने मशीनी उत्पादों से कड़ा मुकाबला मिला। उन्होंने ब्रिटिश लूट के अन्तिम चरण (1880 से) को वित्तीय पूंजीवाद का युग कहा है। इस चरण में, अंग्रेजों ने अपनी राजनीतिक और व्यापारिक जरूरतों के लिए भारत में रेलवे, ठाक और टेलीग्राफ (तार) व्यवस्था कायम की, जिसके चलते, अन्ततः भारतीय जनता कर्ज के बोदा तले दब गई general knowledge in indian history।
यदि हम भारतीय उप-महाद्वीप में अंग्रेजों के आर्थिक विस्तार का गहराई से विश्लेषण करें तो पाएंगे कि आर०पी० दत की विवेचना बिल्कुल सही थी।बंगाल में राजनीतिक घटनाक्रम (1757-65) और फ्रांसीसियों (1756-63) तथा उयों (1659) पर अग्रेजो की विजय ने भारत के व्यापार, वाणिज्य, आर्थिक संसाधनों और उद्योग पर उनके एकाधिकार के लिए अनुकूल परिस्थितियों पैदा कर दी थी।
ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्राथमिक उद्देश्य व्यापार के जरिए कमाई करना था। कम्पनी ने भारत को गुलाम बनाने के अपने अंतिम लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए व्यापारीक सुविधाओं को राजनीतिक दादागीरी से जोड़ा। 1757 के बाद अंग्रेजों ने बंगाल के जमीनी व्यापार पर बड़े पैमाने पर कब्जा किया general knowledge in indian history।
कम्पनी के अधिकारियों और नौकरशाहों ने नमक, सुपारी, तम्बाकू जैसी जिन्सों के व्यापार पर कब्जा किया। सभी यूरोपीय व्यापारियों को इन वस्तुओं के व्यापार की कतई इजाजत नहीं थी। नीर कासिम के शासन काल में यह खराब व्यवस्था नवाब और अंग्रेजों के बीच नियमों के उल्लंघन का सबसे महत्वपूर्ण कारण बनी।
नवाब ने 1762 में कम्पनी के गवर्नर को पत्र लिख कर इस और उसका ध्यान खींचा। वे हिंसा और दमन के जरिए एक चौथाई कीमत पर उनकी वस्तुएँ जबरन खरीदते वे एक रूपया कीमत वाली वस्तु के लिए रियाया को पाँच रूपये देने के लिए बाध्य करते हैं कम्पनी के दस्तावेजों से इस खरीद-फरोख्त की पुष्टि तो होती है, लेकिन असलियत यह थी कि जो लोग इस अनुचित मांग का विरोध करते थे उन्हें कोड़े मारे जाते थे और कैद कर लिया जाता था।
अतः ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल की राजनीतिक सत्ता हासिल करने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था को औपनिवेशिक हितों के अधीन ला दिया general knowledge in indian history top 100 questions in hindi।
1769 में कोर्ट ऑफ डायरेकटर्स ने एक सख्त आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि बंगाल में कच्चा सिल्क तैयार करने वालों को बढ़ावा दिया जाए और रेशमी वस्त्र बनाने वालों को हतोत्साहित किया जाए और रेशम कातने वालों को कम्पनी के कारखानों में काम कटने के लिए मजबूर किया जाए तथा सरकार के अधिकार द्वारा सख्त जुर्माना लगाकर इन्हें अपने घरों में काम करने से पोका जाए।
( general knowledge in indian history in hindi )18वीं सदी के बाद वर्षों ने बंगाल से भारी मात्रा में सम्पदा का शोषण और उद्योगों के विनाश तथा भू-राजस्व में लगातार वृद्धि ने बंगाल को पूरी तरह तबाह कर दिया।
अंग्रेजों ने भारतीय व्यापार, शिल्प और उद्योगों को तबाह करने के लिए संदेहास्पत तरीके अपनाए। ब्रिटेन की संसद ने ब्रिटिश कपड़ा उद्योगों के संरक्षण के लिए अनेक प्रकार के निषेधात्मक और व्यय संबंधी कानून पारित किए। बगाल के मूल्यवान वस्त्रों, जिनकी पूरी दुनियाँ में मांग थी, पर अंग्रेजों ने एकाधिकार कर लिया।
कम्पनी बनुकरों को कर्जा दे कर उन पर अपना एकाधिकार कर लेती थी ताकि उन्हें दूसरों के लिए काम न करे। कम्पनी के एक वरित (सीनियर) नौकरशाह ने 1772 में लिखा कि जो चुनकर कम्पनी के अलावा किसी अन्य को अपनी बस्तुएँ बेचने का दुस्साहस करते थे उन्हें बहुधा जेल में डाल दिया जाता था.
और उन पर भारी जुर्माना लगाया जाता था तथा अत्यन्त नीच तरीके से उन्हें प्रताड़ित किया जाता था। इन तौर-तरीकों का परिणाम यह हुआ कि बुनकर समुदाय ने अपना पेशा ही छोड दिया और अन्ततोगत्वा बंगाल में बुनाई उद्योग का परान हो गया
Important questions and answers in hindi top 100 general knowledge in indian history
प्लासी के बाद, कम्पनी के नौकरशाहों ने नमक निर्माण और नमक बिक्री को अपने नियंत्रण में लाने का प्रयास किया। 1768 में, रॉबर्ट क्लाइय ने एक सोसाइटी के माध्यम से नमक के निर्माण और व्यापार पर अपना कब्जा जमाया general knowledge in indian history।
यह व्यवस्था ज्यादा नहीं चली और 1768 में इसे समाप्त कर दिया गया तथा इसकी जगह एक नई व्यवस्था बनाई गई जिसमें भारतीय व्यापारियों और जमीदारों को नमज बनाने की अनुमति दी गई। इन लोगों को बनाए गए नमक पत्र कम्पनी को 30 प्रतिशत का शुल्क देना पड़ता था general knowledge in indian history।
1772 में, इसे फिर बदला गया, स्थानीय जमीदारों और व्यापारियों को दी गई नमक सुविधा समाप्त कर दी गई और कारोबार पर कम्पनी का एकाधिकार फिर से कायम हो गया। 1778 में, वारेन हेस्टिम्मा ने एक नई स्कीम शुरू की, इसमें नमक बनाने और बेचने की सुविधा लोगों को पट्टे पर दी गई। चार वर्ष के अन्दर ही, कम्पनी सरकार ने फिर से यह कार्य अमने हाथ में ले लिया।
शोरा बारूद बनाने के काम आता मा और यूरोपीय देशों में इसकी भारी मांग थी। 1758 में, रॉबर्ट क्लाइव ने कठपुतली नवाब, भीर जाफर से बगाल में इस व्यापार पर कम्पनी के एकाधिकार की सुविधा हासिल कर ली। इस रियायत से, डच ओर फ्रांसीसी केवल शान्तिकाल में ही अंग्रेजी से शोरा खरीद सकते थे general knowledge in indian history।
1793 तक नील निर्यात की एक दूसरी महत्वपूर्ण वस्तु बन गई। नील संयंत्रों के मालिक मुक्त अंग्रेज व्यापारी थे। उन्होंने नील की खेती करने वाले गरीब किसानों का अत्यधिक अमानवीय शोषण किया। इसी प्रकार ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल और बिहार की अफीम पर भी अपना एकाधिकार जमा लिया। यह अफीम ज्यादातर चीन को निर्यात की जाती थी general knowledge in indian history।
इंग्लैण्ड में भारी शुल्क लगाकर ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपनी दमचीटू नीतियों के द्वारा बंगाल के समूद्ध चीनी उद्योग को भी बरबाद कर दिया। ब्रिटिश नौवहन उद्योग को फायदा पहुँचाने के लिए भारतीय नौवहन पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण फलते-फूलते इस उद्योग को भी गहरा झटका लगा general knowledge in indian history।
ब्रिटेन में औद्योगिक कान्ति और भारत में राजनीतिक दादागीरी के बल पर ब्रिटिश निर्माता भारत को उनके तैयार माल के लिए एक विशाल बाजार के रूप में तब्दील करने में कामयाब रहे। कानूनों और प्रशासनिक नीतियों के माध्यम से, ब्रिटिश सरकार ने भारतीय बाजारों का पूरी तरह दोहन किया।
कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने 1763 में पहली बार बंगाल में लंकाशायर में बना कपड़ा बेचने की पहल की। इसी प्रकार, बंगाल में भारतीय सूती कपड़े और मसलिन के स्थान पर मानचेस्टर में भाप से चलने बाले करमों से तैयार उत्पाद थोपने की शुरुआत हुई general knowledge in indian history।
ब्रिटेन के हितों को प्राथमिकता देते हुए बंगाल सरकार ने ब्रिटिश वस्तुओं पर आयात शुल्क में वाई प्रतिशत की कटौती कर दी इससे भारतीय उद्योगों को गहरा आघात पहुंचा general knowledge in indian history।
असंघटित भारतीय निर्माता, उन्नत वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग करने में अक्षम थे और कम्पनी की सरकार द्वारा शुल्कों में भेदभाव के चलते इस अनुचित और गैर-बराबरी वाले मुकाबले में नहीं टिक सकते थे general knowledge in indian history।
भारतीय कृषि का विस्तार और बाजारीकरण
ग्रामीण भारत पर ब्रिटिश शासन का एक महत्वपूर्ण पहलू भारतीय कृषि ढांचे में दूरगामी बदलाव था। नए प्रशासनिक तंत्र के आने की से कृषि का पुराना ढांचा धीरे-धीर बह गया। उस समय खेती लोगों का प्राथमिक व्यवसाय था और यहां तक कि कपड़ा, चीनी, तेल आदि जैसे उद्योग, कृषि पर निर्भर थे general knowledge in indian history।
ब्रिटिश शासन की आधी सदी में ही, जमीन के मालिकाना हक और जमीन के लगान के आकलन और वसूली के पैटर्न में स्पष्ट बदलाव आया। यह बदलाव भारतीय गांवों की कात्मनिर्भरता और अंग्रेजों से पहले की कृषि व्यवस्था के विनाश का कारण मी बना general knowledge in indian history।
प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेजों ने नए नियुक्त नवाब से दीवानी (बंगाल में कर वसूली का अधिकार) भी हासिल कर ली। वारेन हेस्टिंग्स द्वारा सबसे पहले जमीन के लगान के लिए शुरू किए गए बन्दोबस्त में अजीव प्रावधान थे। उसने सबसे ऊँची बोली लगाने वाले को भूमि आबंटित करने की प्रणाली शुरू की।
इससे विरासत में मिलने वाली जमींदारी की व्यवस्था खत्म होने लगी और गांव की सरकार के साथ सदियों से चली आ रही सम्पर्क कती टूटने लगी और अन्तत यह खत्म हो गई। इससे पहले जय डॉबर्ट क्लाइव बंगाल का दीवान बना, उसने मू-राजस्व की वार्षिक व्यवस्था बनाई general knowledge in indian history।
लेकिन, चारेन हेस्टिंग्स ने इसे पंचवर्षीय कर दिया, पर बाद में इसे फिर वार्षिक कर दिया। इसी प्रकार, लॉर्ड कार्नवालिस ने दसवर्षीय बन्दोबस्त व्यवस्था शुरू की जिसे बाद में 1793 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा में स्थायी बना दिया गया। यह नई व्यवस्था, जिसे आमतौर पर स्थायी बन्दोबस्त व्यवस्था कहा जाता है, जमींदारों के साथ की गई श्री general knowledge in indian history।
इन्हें जमीन का पूरी तरह मालिक माना गया था और इन्हें जमीन का लगान वसूल करने का स्थायी अधिकार दिया गया था। इसे जमींदारी भी कहा जाता है। मोटे तौर पर कहा जाए तो. अंग्रेजों ने भारत में तीन प्रकार की खेतिहर जमीन व्यवस्था अर्थात जमींदारी कार्यकाल/व्यवस्था महलवारी कार्यकाल / व्यवस्था और रखोरावारी कार्यकाल / व्यवस्था अपनायी।
जमींदारी व्यवस्था/स्थायी बन्दोबस्त
ब्रिटिश कानूनों के द्वारा जमीदारी व्यवस्था कायम की गई और अनेक गैर-आर्थिक सरोकार इनमें शामिल होने की वजह से इसे स्वीकार कर लिया गया। इस व्यवस्था को जागीरदारी, मालगुजारी, बिस्वेदारी आदि अनेक नामों से जाना जाता था general knowledge in indian history।
स्थायी बन्दोबस्त के तहत राज्य के भू-राजस्व एकबारगी हमेशा के लिए तय कर दिया गया, जबकि इससे पहले जमीदारी भू-भाग और भू-लगान में एक निर्धारित अवधि के बाद संशोधन किया जात था। यह अवधि 10 से 40 वर्ष तक हो सकती थी general knowledge in indian history।
general knowledge in indian history जैसा कि हम पहले चर्चा कर चुके हैं. बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (राजस्य परिषद) के अध्यक्ष सर जॉन शोर की सिफारिश पर लार्ड कार्नवालिस ने 1783 में यह व्यवस्था लागू की थी। इस नई व्यवस्था के अन्तर्गत, जमींदार को जमीन के मालिक को रूप में मान्यता दी गई, जो जमीन को गिरवी रख सकता है, वसीयत में दे सकता है और बेच सकता है।
इस प्रकार ईस्ट इंडिया कम्पनी का जमींदार एक छोटा-मोटा पूजीपति बन गया जिनों अंग्रेज मशरूम जेंटलमेन” कहते थे। जेंटलमैन होने के नाते सभी प्रकार के लगान देना उसका दायित्व था, चूक होने पर कम्पनी जमीन कुर्क करके बेच सकती थी। इस स्थायी बन्दोबस्त में, ब्रिटिश भारत की कुल जमीन का लगभग 15 प्रतिशत भाग शामिल था। इसे बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उ०प्र० का बनारस सम्माग और उत्तरी कर्नाटक में अपनाया गया था।
लेकिन, इस स्थाई बन्दोबस्त में एक खामी थी। कम्पनी भू-राजस्व 99 प्रतिशत तय किया गया था, जबकि मेहनताने के रूप 11 में प्रतिशत जमींदारों के लिए छोड़ा गया था। general knowledge in indian history हालाकि जमीदार कितना लगान देगा, यह तो तय था, लेकिन जमीदार काश्तकारों से कितना लगान लेगा यह तय नहीं था।
general knowledge in indian history in Hindi top 100 questions कम्पनी द्वारा छोड़ी गई इस कभी के चलते जमींदारों को काश्तकारी का शोषण करने का मौका मिला। आबादी में वृद्धि कृषि भूमि में विस्तार, मूल्यों में वृद्धि और दिन पर दिन बढ़ती जमीन की कमी की वजह से जमींदारों का रसूख बहुत बढ़ गया। अपनी जमीन-जायदाद पर जमींदारों के वंशानुगत अधिकार के चलते जमीन के मूत्र मालिकों और काश्कारों, जिनकी नियति जनीदार की दया पर जीवित रहना था. के बीच लगान उगाहने वाले बिचौलियों और दलाली की नई जमात पैदा हो गई।
ज्यादातर जमीदार मूल रूप से खेतिहर किसान नहीं थे बल्कि पुराने जमीदारों के चरित्रहीन नौकर, कम्पनी राज से जुड़े लोगों, मातहल कृषक सरकारी कार्यालयों के कालर्क, व्यापारी, वकील और ऐसे ही पेशों से जुड़े लोगों में से बने थे। अतः अलग-अलग पेशे के लोग होने के कारण, वे ग्रामीण समस्याओं और अव्यवस्थाओं को समझने में असमर्थ थे। इसका परिणाम यह निकला कि बार-बार मनमाने तरीके से लगान की दरें तय की गई और काश्कारों को उनकी पारम्परिक जमीनों से बेदखल किया गया।
रैयतवारी व्यवस्था
टीपू सुल्तान के साथ 1792 में श्रीनागपट्टम की संधि के बाद दस वर्ष के अन्दर अंग्रेजों ने सबसे ज्यादा समृद्ध और साफ भू-भाग हासिल कर लिया जो आगे बल कर मद्रास प्रान्त बना। अंग्रेजो की इस नई कब्जे वाली जमीन में जमीन बन्दोबस्त की एक नई व्यवस्था धनपी। मदास में जमीन बन्दोबस्त की इस व्यवस्था को रैयतवारी व्यवस्था नाम दिया गया general knowledge in indian history।
इस स्योरावारी बन्दोबसा का तर यॉमस मुनरो से गहरा सम्बन्ध है। सर मुनरो ने सबसे पहले बारामहल का रैयतवारी बन्दोबस्त किया था। जिसमें सीधे 80,000 किसानों के साथ लगान तय किया गया था। उसके इस प्रायोगिक परीक्षण से 1,85,000 रूपये का लगान प्राप्त हुआ जो ईस्ट इंडिया कम्पनी के राजस्य में जबर्दस्त इजाफा था।
general knowledge in indian history in hindi top 100 questions रैयतवारी बन्दोबस्त कम्पनी के प्रामिकारियों को पसंद आया और उन्होंने कनारा, मालाबार, तंजौर आदि जैसे क्षेत्री में लगान बन्दोबस्त की यह व्यवस्था लागू कर दी।
रैयतवारी व्यवस्था का प्राथमिक उद्देश्य लगाम के रूप में जमीन से अधिक से अधिक राजस्व प्राप्त करना तथा रखोतों की हालत में सुधार करना था। पहला उद्देश्य तो पूरा हो गया लेकिन दूसरा उद्देश्य अधूरा ही रहा।
आधिकारिक रूप से यह कहा गया था कि रयोत जब तक जमीन का लगान देता रहेगा उसे उसकी भूमि से नेदखल नहीं किया जाएगा लेकिन लगान की दरें इतनी ऊँची थी कि गरीब किसानों के लिए इसका भुगतानন करना आसान नहीं था। मुनरो ने कास्तकारी निर्धारित करने की सलाह दी थी ताकि रयोत द्वारा सुधार का फायदा कम्पनी को मिले।
general knowledge in indian history Important Questions यहीं यह बताना भी महत्वपूर्ण है कि मद्रास प्रान्त के लिए रैयतवारी व्यवस्था लागू करने से पहले इस पर विस्तार से बहस हुई। विलियम बैंटिक की राय भी मुमरो से मेल खाती थी और उसने दर्ज किया कि जमींदारी व्यवस्था बंगाल के लिए उपयुक्त थी क्यों कि वहाँ बंशानुगत जमीदार मौजूद थे और जहां तक मद्रास का मामला है, यहां ऐसी पराम्परागत जमीदारी नहीं थी।
दर असल, मद्रास, रयोतों के लिए न तो कोई तयशुदा लगान था और इसमे बढ़ोतरी होने की स्थिति में न कोई सुरक्षा थी। स्वाभाविक है कि रैयतों के अधीन जमीन में सुभार का कोई इरादा नहीं था। आर०सी० दत्त का तर्क है कि जमीन पर लगान की अनिश्चतता किसान के सिर पर तलवार की तरह लटकी रहती थी।
1955 के बाद. आकलन का अधिकार राजस्थ अधिकारी को दे दिया गया, जो हर बार बन्दोबस्ती पर अपने विवेक से लगान तम कर सकता था।
महलवारी व्यवस्था
जमीदारी और रयोतवारी जैसी बंदोबस्ती व्यवस्थाए अंग्रेजों की उम्मीद पर खरी नहीं उत्तरी तो महलवारी व्यवस्था के रूप में एक नई व्यवस्था खोजी गई। 1833 से 1853 की अवधि के दौरान आस०एम० बर्ड और जेम्स थॉमसन ने एक विस्तृत सर्वे किया तथा 30 वर्ष का आकलन तय किया general knowledge in indian history।
इस व्यवस्था में, राजस्व निर्धारण के लिए ग्राम या महल यानि जायदाद को एक इकाई माना गया। गाय की जमीन ग्रामीण समुदाय की थी, तकनीकी तौर पर इसे बटाईदार माना गया था और वे लगान चुकाने के लिए संयुक्त रूप से जिम्मेदार थे, हालांकि लगान देना प्रत्येक किसान का दायित्व था general knowledge in indian history।
अत, निश्चय ही यह दो पर्तवाली बन्दोबस्ती थी (क) मालिकाना हक और कब्जेदारी प्रत्येक ग्रामीण को दी गई थी और सभी को खेती अलग-अलग करनी थी, और (ख) किसान जगीन का लगान अंग्रेजों को लम्बरदार अथवा मुखिया के माध्यम से अदा करने के लिए संयुक्त रूप से जिम्मेदार थे। पहले यह व्यवस्था आगरा और अवध क्षेत्र नै लागू की गई।
बाद में इस महलवारी व्यवस्था में उ०प्र० के अधिकाक्ष क्षेत्रों, मध्य प्रान्त, पंजाब आदि में थोड़े-बहुत फेर बदल के साथ लागू करके ब्रिटिश भारत के लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्र को इसमें ला दिया गया general knowledge in indian history।
महलवारी व्यवस्था में सैद्धान्तिक रूप से काश्तकार के पास अपनी मूनि के अधिकार का रिकार्ड था। सरकार भी समय-समय पर अलग-अलग प्रकार की जमीन की उत्पादकता तय करती ब्यौ। आकलन हो जाने के बाद यह आकलन बन्दोबस्ती की पूरी अवधि तक लागू रहता था।
लेकिन व्यवहार ने ऐसा नहीं था, सभी ग्रामीणों को जमीन के अधिकार नहीं दिए गए थे, बल्कि बड़े परिवार वाले कुछ रसूखदार समूहों को ही ये अधिकार मिले थे। अकेले इन समूहों ने ही संयुका मालिकाना हक का फायदा उठाया, जबकि सामान्य रयोतों को काश्तकार उप-काश्तकार, बटाईदार आदि बना दिया गया था general knowledge in indian history।
इस प्रकार, सामाजिक और आर्थिक असमानता बढ़ी और किसानों की हालत बिगड़ी। छोटे कास्तकारों के पास बहुत कम जमीन थी और गांव के मुखिया द्वारा बहुधा इनका दमन किया जाता था। इसके अलाब, इससे ग्रामीण समुदाय टुकडो में में बटा सामाजिक नजरिए से यह व्यवस्था अनर्थकारी रही और आर्थिक नजरिए से यह व्ययस्था पूरी तरह से असफल रही।
अंग्रजी ने सरकार के राजस्व में इजाफे के इरादे से जमींदारी, रयोतवारी और महलवारी व्यवस्थाए लागू की थी। इनमें किसान और शासक के बीच सदियों पुराने रिश्ते को खत्म करके राजस्व बन्दोबस्ती की पुरानी व्यवस्था, जिसमें जमींदार किसानों का सर्वस्व था. त्याग दी गई general knowledge in indian history।
पुरानी व्यवस्था की जगह एक नई व्यवस्था कायम की गई, जिसमे नए जमीदार उभरे जिनके लिए सत्ता के हित सर्वोपरि थे। जमींदार जमीन के मालिक बन गए और कृषि कार्य कंवल काश्तकारी (लगान देकर जमीन कमाना) बनकर रह गया। महलयारी तथा रयोतवारी के तहत, हालांकि स्योत जमीन के मालिक बने, लेकिन जमीन पर उनका हक संदेहास्पद था।
स्थाई बन्दोबस्त के तहत जमींदार 12 वर्ष से ज्यादा के लिए अपनी जमीन पट्टे पर नहीं दे सकते थे. लेकिन कई जमींदारों ने अपनी जमीन पट्टे पर दे दी। तथापि यह प्रतिबन्ध 1812 में समाप्त कर दिया गया, और पट्टा अनुबंध पर जमीन देने की कोई सीमा नहीं रहीं। खेतों के दुकयों टुकडों में बंटने से जमींदारों की आर्थिक सम्पत्ति में वृद्धि हुई general knowledge in indian history।
जमींदारों ने अपने कास्तकारों की कमजोर माली हालत को देखकर उन्हें तकावी कर्ज दिए, लेकिन नए शोषणकारी लगान के दबाव में वे इस प्रथा को जारी नहीं रख सके। इसने एक नए वर्ग यानि साहूकारों या महाजनों को जन्म दिया और गरीब तथा मूखे किसान इनके शिकार बने।
स्वदेशी उद्योगों का पतन, हम इस बारे में यूनिट के अगले भाग में चर्चा करेंगे, होने से लोग जीवनयापन के लिए खेती पर निर्भर होने लगे। कृषक समाज के पुराने औजारों और उपकरणो से सरकार तेजी से प्रगति करते कृषक भारत का सपना तो देख रही थी पर कृषि को बेहतर बनाने के लिए अपनी तरफ से कोई प्रयास नहीं कर रही थी general knowledge in indian history।
अंग्रेजों की लगान नीतियों का आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
19वीं सदी में लगान की ऊँची दरों के चलते गरीबी बढ़ी और खेती-बाडी में गिरावट आई, इससे किसान तबाह हो गए। किसान, महाजनी, व्यापारियों, धनी किसानों और अन्य समृद्ध वर्गों के शिकंजे में फंस गए। बढ़ते बाजारीकरण से महाजनों और व्यापारियों को खेतिहर समुदाय के शोषण का मौका मिला general knowledge in indian history।
किसान को फसल कटाई के तुरन्त बाद अपनी फसल बेचनी पड़ती थी ताकि वो सरकार और जमीदारों तथा महाजनों को लगाम और कर्ज चुका सकें। इनके अलावा, खेती पर बढ़ते आबादी के दबाव से किसानों की हालत खराब हो गई general knowledge in indian history।
किसानों की कर्जदारी में वृद्धि
उपरोक्त कारणों से अंग्रेजों के शासन में नारतीय किसान कर्ज के बोझ तले दबता चला गया। 1880 के बाद ग्रामीण ऋणग्रस्तता गुणोत्तर दर से बड़ी जो चौकाने वाली थी। हालांकि किसानों की कर्जदारी कोई ऐसी नई घटना नहीं थी जो अंग्रेजों को शासन में घटित हो रही थी general knowledge in indian history।
लेकिन ब्रिटिशों का राजनीतिक वर्चस्व स्थापित होने के बाद, इस कर्जदारी को एक नया आयाम मिला। नई परिस्थितियों के चलते अंग्रेजों ने भारी कराधान के रूप में किसानों पर नए-नए कर लगाए। ये वसूलियाँ ग्रामीण भारत की आणग्रस्तता का प्रमुख कारण बनी general knowledge in indian history।
महाजन, अंग्रेजों द्वारा शोषण का मुख्य औजार बने, इन्होंने कानूनी तंत्र द्वारा लागू अनुबंधों के आधार पर किसानों को कर्ज दिया। यदि किसान अपना कर्ज नहीं चुका पाता तो उसकी सम्पत्ति कुर्क बार ली जाती थी। ग्रामीण कर्जदारी बढने का एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण कृषक समुदाय में व्याप्त आम गरीबी और धनवान लोगों पर इनकी निर्भरता था।
किसानों की बढ़ती ऋणग्रस्तता की वजह से रसोतवारी वाले क्षेत्रों में किसानों की जमीन बड़े पैमाने पर महाजनों के पास चली गई और जमीदारी वाले क्षेत्रों में काश्कारों को मारी संख्या में उनके खेतों से बेदखल किया गया। अलग-अलग प्रान्ती में ब्याज की दरे अलग-अलग थीं general knowledge in indian history।
ये ब्याज दरें 12 प्रतिशत से लेकर 200 या 300 प्रतिशत तक थी। इसके चलते गाय के लोग शाहकार/महाजन या कर्जदाता को नफरत की नजर से देखते थे और ये तबका गाब में बदनाम था। दुर्जन स्वाभाव की वजह से इन साहूकारों को सम-सामयिक साहित्य, नाटकों और ऐसे ही कथानकों में खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है general knowledge in indian history।
नए आर्थिक माहौल से गरीबी की हाताल में आए किसान अपने कर्ज के बदले महाजनों को अपनी जमीन देने लगे और इस तरह उनकी ज्यादा से ज्यादा जमीन महाजनों के कब्जे में चली गयी। ऋणग्रस्तता से ग्रामीणों की स्थिति दयनीय हो चुकी थी। हालात देखते हुए सर हैमिल्टन ने लिखा कि ऐसा प्रतीत होता है कि पूरा देश महाजनी के शिकंजे में है।
यही दूसरी तरफ, कानूनी लड़ाई इतनी खचीली थी कि गरीब किसान मानवान महाजनों का मुकाबला नहीं कर सकते थे। महाजन वकीलों की सहायता से लम्बे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ सकते थे लेकिन गरीब किसान वकीलों की मारी नरकम फीस चुकाने में असमर्थ थे general knowledge in indian history।
भारतीय कृषि का बाजारीकरण
19वीं सदी के मध्य में कृषि बाजारीकरण की नीति शुरू होने के बाद भारतीय कृषि में एक नया रुझान देखने को मिला। एक निर्धारित मनरशि लगान के रूप में अदा करने की व्यवस्था तथा गांव और खेत के रिश्ते को नए रूप में परिभाषित किए जाने की वजह से यह नया रुझान नजर आया पहले ग्रामीण खेती का मतलब गांव के लिए फसल उत्पादन था।
लेकिन अब बिक्री के इरादे से फसल और उत्पादन तय किया जाने लगा और उपज बाजार से जुड़ गई। 1833 के आस-पास, विदेशी बाजार में निर्यात के इरादे से बंगाल में जूट की खेती शुरू की गई। कुछ समय बाद कपास का निर्यात्त भी शुरू कर दिया गया। लेकिन, 1850 तक इन वस्तुओं का व्यापार काफी सीमित था general knowledge in indian history।
इस व्यवस्था के अन्तर्गत किसान मुख्यतया बाजार के लिए फसल उगाते थे ब्रिटिश शासन में बुलाई के साधनों में सुधार होने और किसानों को कारोबारी पूंजी मिलने से बाजारी फसलों का उत्पादन बढ़ने लगा। किसानों को सरकार को मारीभरकम लगान चुकान होता था और इसके लिए उन्हें नकदी की जरूरत थी general knowledge in indian history.
इसलिए ऐसी उपजों की ओर उनका रुझान बढ़ा और भारतीय कृषि का बाजारीकरण होने लगा। किसान कुछ खास फसलें उगाने लगे। कयास जूट, गेंहू, गन्ना, तिलहन, नील, अफीम आदि जैसी एकल कृषि फसली की खेती के लिए ही गांवों की जमीन का उपयोग होने लगा। अंग्रेजों ने कपास की जननी कहे जाने वाले देश को इंग्लैण्ड में बने सूती कपड़े से लाद दिया।
भारतीय किसान अब भारतीय और विश्व बाजार के लिए उत्पादन करने लगे थे इस तरह के अस्थिर बाजार के उतार-चढ़ावों के अधीन आ गए। उन्हें. नई तकनीकों से भारी मात्रा में उत्पादन करने वाले अमरीका, यूरोप और आस्ट्रेलिया जैसे देशों से मुकाबला करना था general knowledge in indian history।
वही दूसरी तरफ, भारतीय किसान, अपने छोटे-छोटे खोतों में परिवार के सदस्यों के सहयोग से बैलों से खेती करते थे। इन उत्पादों से होने वाली आय लगान बुकाने के लिए भी पर्याप्त नहीं होती थी। इसके अलावा बाजारीकरण के चलते खेतिहर किसान व्यापारियों को अपने उत्पादों की बिक्री पर निर्भर हो गए और ये व्यापारी बिचौलियों के रूप में किसानों का शोषण करते थे। ये व्यापारी अपनी समृद्ध माली हालत से किसनों की मजबूरी का पूरा लाम उठाते थे।
इन नए हालातों से ग्रामीण समाज भयंकर गरीबी से ग्रस्त हो गए और इनका दिवाला निकल गया। ज्यादातर भारतीयों के पास सामान्य जीवन जीने के लिए भी साधन नहीं थे और बार-बार पढ़ने वाले सूखे और बाढ़ में काल का निवाला बन गए general knowledge in indian history।
विलियम दिगबी के अनुमानों के अनुसार, 1864 से 1901 के बीच भारत में 24 बार अकाल पड़ा, जिनमें 29 मिलियन (यो करोड़ न लाख) भारतीयों की मौत हुई। 20वीं शताब्दी में भी हालात में कोई खास सुमार नहीं हुआ। आजादी से कुछ साल पहले 1943 में बंगाल में भयंकर सूखा पड़ा जिसमें 30 लाख लोगों की जान गई।
ये भयंकर सूखे बताते है कि गरीबी, मुखमरी, कुपोषण और नवजात शिशुओं की मृत्युदर सारी हदें पार कर चुकी थी। भारत में पड़ने वाले सूखों की सचत्ते खराब खासियत यह थी कि लोग सूखा, बाद फसल खराब होने और अनाज उपलब्ध न होने के कारण नहीं भरते थे, बल्कि लोगों के पारा अनाज खरीदने के लिए पैसा न होने के कारण मरते थे general knowledge in indian history in hindi important questions।
उद्योगों का पतन और शिल्पकारों के बदलते हालात
ब्रिटिश-पूर्व भारत में ग्रामीण उद्योग संतुलित और आत्म निर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग था। भारतीय गांवों की सभी औधोगिक जरूरते गांव में ही पूरी हो जाती थीं। लेकिन, ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू सनी नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया और भारत की पारम्परिक शिल्पकला भी इससे अछूती नहीं रही। भारत की शानदार शिल्पकारी को देखकर पश्चिमी लोग नारत को विश्व की औद्योगिक कर्मशाला सम्झाते थे।
हालांकि, नारत मूलतः कृषि प्रधान देश था. लेकिन देश के अन्दर ही समान्तर तवनुरूपी अनेक प्रकार के उद्योग भी फल-फूल रहे थे। तथापि, शाही दरबारों के खत्म होने से हस्तशिल्प की मांग में मानी कमी आई। इसी प्रकार, मुगल साम्राज्य के पत्तन के बाद बंगाल में निर्मित वस्तुओं की मांग गिरी general knowledge in indian history।
अवध के नवाब के दरबार के पलन से लखनऊ के रंगाई उद्योग को गहरा आघात लगा। यही दूसरी तरपा भारत में अंग्रेजी के पदार्पण के बाद पाश्चात्य देशों के ऐसे पेशेवर अधिकारी आए जो स्वदेशी उद्योगों के उत्पादों को हिकारत की नजर से देखते थे और यूरोप के सस्ते सूती वस्त्र, छापे वाले सुती परिधान और अश्लील वस्त्र पसंद करते थे general knowledge in indian history।
पढ़े-लिखे भारतीयों ने पाश्चात्य लोगों की नकल करने की कोशिश की, यूरोपियन शैली और फैशन अपनाया। भारत की देशी कला और दस्तकारी इन अंग्रेजी-दा लोगों को अब पसंद नहीं आती थी general knowledge in indian history।
आर०सी० दत्त की टिप्पणियों के अनुसार, ईस्ट इंडिया कम्पनी और ब्रिटिश पार्लियामेंट की अनार्यकारी नीतियों भारतीय हस्तकला के पतन के लिए मुख्यतया जिम्मेदार थीं। आरम्भ में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारतीय शिल्पकला को प्रोत्साहित किया, क्योंकि इन हस्तनिर्मित वस्तुओं के यूरोपीय बाजार में निर्यत से उन्होंने बहुत मुनाफा कमाया।
लेकिन, जल्दी ही कम्पनी को अपनी नीतियों बदलने के लिए मजबूर किया गया और उनसे कहा गया कि केवल कच्चे माल के निर्यात पर ध्यान दें, क्योंकि ब्रिटेन के कारखानों को इसकी जरूरत थी। यही नहीं, बिजली से चलने वाले करधी ने भी भारतीय वस्त्र उद्योग के पतन में बहुत बढी भूमिका निभाई general knowledge in indian history।
कार्ल मार्क्स के शब्दों में, “अंग्रेजों के बिजली से बलने वाले करयों ने भारत के हथकरघों को ध्वस्त कर दिया और कपास की जननी कहे जाने वाले देश को सूती सी कपड़ों से लाद दिया।
हालांकि, भारतीय दस्तकार मशीनों से बनी वस्तुओं का मुकाचाला कर सकते थे, बशर्ते कीमत के मामले में मुकाबला निष्पक्ष हो। लेकिन कीमत के मामले में तो उनके साथ भेदभाव हो रहा था। रेलवे लाइनों के निर्माण और तुलाई के साधनों तथा सचार के रराधनों में उन्नति में आयातित वस्तुओं को देश के दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुँकाना आसान बना दिया।
इससे वस्त्र उद्योग और शिल्पकला को जबर्दस्त नुक्सान पहुंचा। किसान भी गांवों के कुटीर उद्योग के पतन का कारण बने। सूचे के दौरान गरीय शिल्पकार, विशेषकर बुनकर, सोमेई और काम तलाश कार अपना जीवन यापन करने में असमर्थ रहे।
general knowledge in indian history in Hindi
शिल्पकारों की स्थिति में बदलाव का एक और पहलू यह था कि वे दिहाड़ी पर काम करने वाले कामगार बनने लगे। उदाहरण के लिए पहले वे हुनरमंद लोग ग्रामीणों की जरूरते पूरी करते थे और बाजार में बेचने के लिए कभी भी कोई औजार या उपकरण नहीं बनाते थे general knowledge in indian history।
नई परिस्थितियों में, बुनकर अपने उत्पादों की स्थानीय और दूर-दूर को बाजार में बिक्री के लिए बिचौलियों पर निर्भर होने लगे। इसके अलावा, बाजार में टिकने के लिए और ज्यादा पूंजी की जरूरते पढ़ने लगी तथा शिल्पकार बिचौलियों के शिकंजे में फसने लगे general knowledge in indian history।
कई शिल्पी अपना पारंपरिक पेशा छोड़ कर शहरों को पलायन गये और वहां मजदूरी पर काम करने लगे या बहुत कम मजदूरी पर दूसरों के लिए अन्य काम करने लगे। गौरतलब है कि गृह उद्योगों के पत्तन से तत्कालीन अर्थव्यवस्था की गहरा झटका लगा और ग्रामीणों का आर्थिक जीवन तबाह हो गया। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में शिल्पकार बेरोजगार होकर खेती पर निर्भर हो गए।
डी-औद्योगिकीकरण
जैसा कि अभी तक हमने देखा कि 19 वी सदी के प्रथम उत्तरार्ध से लेकर 1880 तक, भारत की अर्थव्यवस्था में एक विचित्र बदलाव आया। जब यूरोपीय देशों का उद्योगीकरण हो रहा ग्या, तब भारत में देशी उद्योग पतन की ओर अग्रसर थे। देशी उद्योगों के इस अपकर्ष को ही अनौद्योगीकरण के रूप में दर्शाया गया है। औद्योगिक क्रानित की इस अवधि में माता को ब्रिटेन का खेतिहर उप-अंग बना दिया गया था।
इंग्लैण्ड और अन्य यूरोपीय देशों में स्वदेशी आधुनिक उद्योगों ने देशी हस्तशिल्प को बरबाद कर दिया। अपने पेशे से बेदखल हुए शिल्पकार स्वदेशी आधुनिक उद्योगों में खप गए। भारत में, घरेलू शिल्पकलाओं का पतन तो हुआ लेकिन इसके साथ-साथ कोई मशीनी उद्योग नहीं लगे general knowledge in indian history।
आर०सी० दत्त ने भारतीय उत्पादों की जगह विदेशी उत्पादों द्वारा लिए जाने की इस प्रक्रिया को ब्रिटिश भारत के इतिहास का सबसे दुखद अध्याय कहा है। अर्थव्यवस्था के कृषि और उद्योग क्षेत्र के बीच संतुलन बिगडने तथा घरेलू उद्योगों के दमन के कारण राष्ट्रीय आय के स्रोत पूरी तरह नष्ट हो गए।
ब्रिटिश उद्योगों की हुंकार ने लाखों कारीगरों को उनके पारम्परिक पेशे से पचित कर उन्हें खेती पर निर्भर होने के लिए मजबूर किया। जीवन-यापन के लिए खेती पर आबादी का दबाव बढ़ा और देश में नगर गांवों में तब्दील होने लगे यानी देश का ग्रामीणीकरण होने लगा general knowledge in indian history।
“सम्पदा पलायन”
भारत से ब्रिटेन को सम्पदा के निर्वाध प्रवाह और बदले में आर्थिक, वाणिज्यिक अथवा साजो-समान के रूप में पर्याप्त प्रतिफल न मिलने को भारत के राष्ट्रवादी नेताओं और अर्थशास्त्रियों ने भारत से सम्पदा पलायन” का नाम दिया है।
प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेजो ने भारत को गरीब बनाने की लागत पर अपने आप को अमीर बनाने के लिए भारत से कच्या माल लगातार लूटा। इस निरन्तर लूट की प्रक्रिया में सम्पदा पलायन के सिद्धान्त को जन्म दिया। दादाभाई नौरोजी और एम०जी० रानाडे आदि जैसे राष्ट्रवादी विचारकों को इस सिद्धाना का जनक कहा जा सकता है general knowledge in indian history.
2 मई 1667 को ईस्ट इंडिया एशोसिएशन की बैठक में नौरोजी ने अपना एक लेख पढ़ा जिसका शीर्षक था इंग्लैन्हस रोस्ट टू इदिया। नौरोजी के विचार पलायन की अवधारणा के रूप में चर्चा और मनन का विषय बने। इसके बाद तो दादाभाई नौरोजी के एक के बाद एक सनी लेखी की मुख्य विषय वस्तु हमेशा, भारत से नैतिकता और कच्चे माल का पलायन रहा general knowledge in indian history।
पॉवरटी एण्ड अन-ब्रिटिश कल इन इंडिया (1867) दी वान्ट्स एण्ड मीन्स ऑपा इंडिया (1870) और “ऑन दी कौनर्स ऑफ इंडिया (1871) उनकी अन्य सराहनीय कृतियों है। इनमें नौरोजी ने अंग्रेजों की नारत में बुरी तरह आर्थिक लूट की अत्यन्त उपहास भरे अन्दाज में आलोचना की है general knowledge in indian history।
1857 के बाद से, दादाभाई ने अपना जीवन पूरी तरह से, पलायन के सिद्धान्त के प्रचार-प्रसार में समर्पित कर दिया। 1880 में उन्होंने लिखा आज का ज्वलंत प्रश्न यह है कि भारत से खूनी रिसाव को किस प्रकार रोका जाए”। 1886 में, उन्होंने अपने सर्वाधिक आलोचनात्मक विश्लेषण में ब्रिटिश प्रशासन का मजाक उठाया उन्होंने लिखा पूरे मसले का लब्बोलुआब यह है कि मौजूदा अन्यायपूर्ण और शैतानी प्रशासन के सार्यों के तहत ब्रिटिश शासन का परोपकार कोरी कल्पना है, जबकि ब्रिटिश शासन की रक्त पिपासा एक असलियत है।
“पलायन” के सिद्धान्त के एक और प्रचारक न्यायमूर्ति एम०जी० रानाडे है। उन्होंने 1872 में पूना में एक व्याख्यान दिया था. उन्होंने शोषण की अत्यन्त मुखर आलोचना की थी। अपने व्याख्यान में उन्होंने कहा अंग्रेजों ने किसी न किसी रूप में राष्ट्र की एक तिहाई पूंजी हरूप कर ब्रिटेन भेजी general knowledge in indian history।
‘पलायन सिद्धाना के एक और जबर्दसा समर्थक रोमेश चन्द्र दत्त ने भारत में ब्रिटेन की आर्थिक नीतियों की धज्जियाँ उड़ाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। इकॉनॉनिक ब्यौरी ऑफ इंडिया (1901) प्रथम ग्रप्पा के आमुख में उन्होंने बताया कि भारत के शुद्ध राजस्व का आधा भाग बाहर भेजा जा रहा था।
उन्होंने कहा दरजसल भारत का मानसून दूसरों के खेत पर बरस कर उसे उपजाऊ बना रहा है। उन्होंने आगे कहा “देश के संसाधनों का ज्ञाना ज्यादा आर्थिक शोषण किया जा रहा है और इस लूट को बाहर मेजा जा रहा है कि दुनियों का सबसे ज्यादा रागुद्ध देश एक दिन कगाल हो जाएगा general knowledge in indian history।
इस शोषण ने भारत को ऐसे जमीन के टुकड़े में बदान दिया है, जही बार-बार अकाल पडला है, हर बार यह पिछले अकान से ज्यादा भयानक और जान लेवा होता है। इस कदर तबाही लाने वाले अकालों के बारे में भारत या दुनिया के इतिहास में पहले कमी मी कोई वर्णन नहीं आया है।
दत्त का मानना है कि नादिरशाह जैसे विदेशी हमलावरों की लूट-पाट की तुलना में सम्पदा पलायन” ज्यादा विनाशकारी सावित हुआ। नादिर शाह भारत आया और लूट-पाट मत्रा कर तत्काल वापस बला गया। सम्पति का नुक्सान अस्थाई रहा गाज गिरी और खत्म हो गयी। इसके अलावा, इस तरह के हमाले कभी-कभार होते थे general knowledge in indian history।
लेकिन अंग्रेजों द्वारा शोषण तो उनके प्रशासन का एक अभिन्न हिस्सा था. इसलिए निरन्तर और अन्तहीन था जो वर्ष दर वर्ष बढ़ता ही जा रहा था। भाव को कुरेद कर हमेशा हरा रखा गया और यह शोषण नासूर बन गया general knowledge in indian history।
ऐतिहासिक नजरिए से देखा जाए, तो सम्पदा पलायन वा सम्पदा शोषण का सिद्धान्त आम आदमी की भाषा में ब्रिटिश शासन की विदेशी और शोषणकारी विशेषला की उजागर करता है general knowledge in indian history।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1898 के अपने कलकता सत्र में जैन थ्यौरी शोषण या पलायन सिद्धान्त को आधिकारिक रूप से अंगीकार किया और कहा कि भारत में दुर्मिक्ष (अकाल) और लोगों की गरीबी का कारण देश का वर्षों से बता जा रहा आर्थिक शोषण है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान, भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की मर्त्सना में यह सिद्धान्त एक सहज नारा बना।
Average Rating