17वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया प्रारंभ होने के साथ ही देश में स्वतंत्र राज्यों की स्थापना का जो सिलसिला आरंभ हुआ, उनमें राजनीतिक दृष्टि से सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य मराठों का था. यह मूल रूप से वर्तमान महाराष्ट्र में शिवाजी के द्वारा स्थापित हुआ general knowledge in indian history।
18वीं शताब्दी के दूसरे दशक में मराठा साम्राज्य का शासन मुख्य रूप से पेशवा के हाथों में आ गया. पेशवा का पद क्रमशः पैतृक और शक्तिशाली होता गया.

यदि यह कहा जाए कि पेशवा ही मुख्य रूप से शासक थे तो गलत नहीं होगा, दरअसल पेशवाओं ने मुगल साम्राज्य के खंडहर पर मराठा साम्राज्य का विस्तार किया परन्तु इन्हीं परिस्थितियों का लाभ उठाकर अंग्रेजों का कंपनी शासन भी अपना विस्तार कर रहे थे,
यदि मराठे शेष भारतीय शक्तियों में सर्वाधिक शक्तिशाली थे तो अंग्रेज भी शेष यूरोपीय कंपनियों में सर्वश्रेष्ठ थे. अतः दोनों में संघर्ष निश्चित था. 18वीं शताब्दी के अंतिम दशक में आंग्ल-मराठा संघर्ष का सूत्रपात हुआ, जो प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय आंग्ल-मराठा संघर्ष के रूप में घटित हुआ और अंततः अंग्रेज विजयी रहे फलस्वरूप अंग्रेजों ने मराठा राज्यों का विलयअपने राज्य में कर लिया.
इस इकाई का उद्देश्य आपको अंग्रेज और मराठों के बीच हुए संघर्ष से अवगत कराना है. सर्वप्रथम हम संक्षिप्त चर्चा मराठा साम्राज्य के बारे में एवं पेशवा की भूमिका पर करेंगे, इसके बाद ब्रिटिश मराठा संघर्ष के कारण, परिस्थितियां, संघर्ष के विभिन्न युद्ध, उनके परिणामस्वरूप उभरने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करेंगे.
अंत में आंग्ल-मराठा संघर्ष में माराठा साम्राज्य के पतन एवं हार के लिए उत्तरदायी कारकों की भी समीक्षा करेंगे.
मराठा साम्राज्यः एक संक्षित विवरण
मराठा राज्य की औपचारिक स्थापना 14 जून 1674 को शिवाजी के राज्याभिषेक से माना जाता है. शिवाजी (1627- 80) अपने संपूर्ण शासन काल में मुगलों से संघर्ष करते रहे general knowledge in indian history.
1680 में उनकी मृत्यु के पश्चात पुत्र शंभाजी उत्तराधिकारी बने परंतु 1689 में मुगल सेना ने शंभाजी को पराजित कर मार डाला तथा उनके पुत्र साहुजी को कैद कर लिया. मुगलों के विरुद्ध चलने वाले मराठा संघर्ष का नेतृत्व शंभाजी के सौतेले भाई राजाराम (1689-1700) ने जारी रखा, राजाराम के 1700 ई general knowledge in indian history.
में मृत्यु के उपरांत उनकी विधवा पत्नी ताराभाई ने अपने चार वर्षीय पुत्र को शिवाजी द्वितीय के नाम सेगद्दी पर बैठाया परन्तु 1707 में मुगल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल शासन की शिथिलताओं का लाभ मराठों को मिला तथा इसी वर्ष साहूजी तो मुगल कैद से रिहा कर दिया गया और वह मराठवाड़ा लौट आया.
उसने सत्ता पर अपना अधिकार जताया. सत्ता के विवाद के कारण वर्तमान शासक शिवाजी द्वितीय एवं उनकी संरक्षिका ताराबाई तथा साहूजी के मध्य खेड़ा का युद्ध हुआ general knowledge in indian history in Hindi.
इस युद्ध में साहूजी को बालाजी विश्वनाथ की सहायता से विजय मिली तथा साहूजी मराठा शासक (1707-1748) बने तथा शिवाजी द्वितीय एवं ताराबाई को एक समझौते के तहत कोल्हापुर दे दिया गया, साहूजी ने 1713 में अपने सेनापति बालाजी विश्वनाथ को पेशवा (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया साहूजी के नेतृत्व में पेशवा की सहायता से एक नवीन मराठा साम्राज्य की स्थापना की गई.
पेशवा और मराठा साम्राज्य
मराठा शासन व्यवस्था में पेशवा नवीन साम्राज्यवाद के प्रवर्तक थे. ये औपचारिक तौर पर तो छत्रपति के प्रधानमंत्री थे परन्तु शासन की वास्तविक शक्तियां क्रमशः ( general knowledge in indian history top 100 )पूरी तरह से पेशवा में निहित होती चली गई.
बालाजी विश्वनाथ के प्रयास से मुगलों और मराठों के मध्य एक समझौता हुआ, जिसमें दक्कन के 6 मुगल प्रातों में चौथ एवं सरदेशमुखी का अधिकार, मालवा एवं गुजरात में चौथ वसूली का अधिकार तथा साहूजी को महाराष्ट्र में स्वतंत्र स्थिति की मान्यता दी गई, पेशवा मराठा साम्राज्य में सत्ता और हर प्रकार के संरक्षण का स्रोत बन गया.
बालाजी विश्वनाथ की 1720 में मृत्यु के चाद उनके पुत्र बाजीराव प्रथम (1720-40) को पेशवा नियुक्त किया गया. इस तरह से पेशवा का पद भी पैतृक हो गया. बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में मराठा शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गई general knowledge in indian history in Hindi.
उसने न केवल दक्कन में सर्वोच्चता स्थापित की अपितु दिल्ली में मुगल बादशाह तक उसने आक्रमण किया, बाजीराव प्रथम की मृत्यु के पश्चात बालाजी बाजीराव (1740-61) पेशवा नियुक्त हुए, इन्हीं के कार्यकाल में साहूजी का निधन 15 दिसंबर 1749 को हो गया. साहूजी को कोई संतान नहीं थी.
अतः उन्होंने ताराबाई के पौत्र राजाराम द्वितीय को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था. जनवरी 1750 में राजाराम द्वितीय का छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक हुआ. ताराबाई शासन पर अपना बर्चस्व चाहती थीं परन्तु पेशवा को यह स्वीकार नहीं था. अतः 1750 में राजाराम द्वितीय एवं पेशवा के बीच संगोला की संधि हुई general knowledge in indian history in Hindi.
जिसके अनुसार मराठाछत्रपति केवल नाममात्र के शासक रह गए, जबकि वास्तविक शासन पेशवा वंशानुगत तौर पर बन गए, मराठे इतने शक्तिशाली थे कि मुगल बादशाह का निर्णय करने लगे, अवध, बंगाल, उड़ीसा, लाहौर, सरहिंद तक आक्रमण किये, मराठों को सर्वाधिक क्षति पानीपत के तृतीय युद्ध में अहमद शाद अब्दाली के आक्रमण से हुआ.
अब्दाली ने इस युद्ध में मराठों को परास्त किया, इस युद्ध में मराठों का सर्वाधिक जनक्षति हुई प्रमुख मराठा सरदार मारे गए, इसी के बाद बालावी बाजीराव की 23 जून 1761 को मृत्यु हो गई. उनका पुत्र माधव राव प्रथम मात्र 17 वर्ष की आयु में पेशवा बना, माधव राव पानीपत के युद्द से हुई क्षति से आगे निकलकर पुनः एकबार मराठा साम्राज्य के प्रभाव को पुनः स्थापित करने का प्रयास कर ही रहा था कि नवंबर 1772 में क्षय रोग से उसकी मृत्यु हो गई.
आंग्ल-मराठा संघर्ष की पृष्ठभूमि
पेशवा माधव राव की मृत्यु के बाद उसका भाई नारायण राब पेशवा बना परन्तु एक वर्ष बाद ही उसके चाचा रघुनाथ राव ने उसकी हत्या करचा वी और स्वयं पेशवा का पद प्राप्त करने का प्रयास करने लगा. पेशवा पद प्राप्त करने का यही आंतरिक मतभेद एवं संघर्ष ने अंग्रेजों को हस्तक्षेप करने का अवसर दे दिया general knowledge in indian history.
रघुनाथ राव (रघोबा) पेशवा का पद प्रप्त करने में असफल रहा क्योंकि उसपर हत्या के आरोप के कारण प्रमुख मराठा सरदार उससे नाराज थे तथा ( general knowledge in indian history ) इसी बीच नारायण राव की विधवा गंगाबाई ने 18 अप्रैल 1774 को एक पुत्र को जन्म दिया,
मराठा सरदारों के परिषद ने 28 मई 1774 को गंगाबाई के पुत्र को माधवराव नारायणराव द्वितीय के नाम से पेशवा स्वीकार कर लिया, अल्पायु के पेशवा माधव नारायण राव द्वितीय की सहायता के लिए मराठा सरदारों का एक 12 सदस्यीय परिषद बना जिसे ‘बाराभाई परिषद के नाम से जाना जाता था general knowledge in indian history.
इस परिषद में सखा राम बापू, महादजी सिंधिया और नाना फडनवीस जैसे प्रमुख मराठा सरवार थे. वहीं दूसरी ओर मराठा सरदारों की परिषद ने रघुनाथ राव पर हत्या की जांच की सिफारिश भी कर दी. रघुनाथ राय ने अपने जीवन को खतरे में देख अंग्रेजों की शरण ली और उनसे स्वयं को पेशचा बनाने की अपील की. इस प्रकार अब पेशवा पर को लेकर मराठों के बीच चल रहा आंतरिक संघर्ष खुलकर सामने आ गया
सूरत की संधि
6 मार्च 1775 ई. में रघुनाथ राव और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बंबई प्रेसिडेंसी के बीच एक संधि हुई, जिसे ‘सूरत की संधि’ के नाम से जाना जाता है. इस संधि की प्रमुख शतों के अनुसार
- ईस्ट इंडिया कंपनीरघुनाथ राव को पेशवा पद प्राप्त करने में सहायता प्रदान करेगी.
- रघुनाथ राव कंपनी की बंबई प्रेसिडेंसी को बसीन, सालसेट और जम्बूसर (गुजरात) के प्रदेश देगा.
- इसके बदले रघुनाथ की सहायता के लिए 2500 अंग्रेज सैनिक पूना में रखे जाएंगे, जिसका खर्च 1.25 लाख
- रुपये प्रति वर्ष के हिसाब से रघुनाथ कंपनी को देगा.
- रघुनाव राव अंग्रेजों को शामिल किए बिना कोई संधि नहीं करेगा.
उल्लेखनीय तथ्य यह है कि 1773 ई. में ब्रिटिश संसद में रेग्यूलेटिंग एक्ट पारित होता है. जिसके माध्यम से बंबई और मद्रास प्रेसिडेंसियों पर बंगाल के गर्वनर जनरल एवं उसकी काउंसिल का नियंत्रण स्थापित किया गया general knowledge in indian history.
जबकि बंबई प्रेसिडेंसी ने बिना गर्वनर जनरल के अनुमति के सूरत की संधि की और मात्र पत्र लिखकर गर्वनर जनरल को इसकी सूचना भेज दी इस तरह मराठे के आपसी झगड़े, अंग्रेजों की महात्वाकांक्षा एवं सूरत की संधि के कारण आंग्ल-मराठा संघर्ष की नींव डाल दी.
सूरत की संधि (6 मार्च 1775) के बाद बंबई की कंपनी सरकार ने रघुनाथ राव की सहायता के लिए अंग्रेज सेना भेज दी. याहीं से आंग्ल-मराठा युद्ध की शुरूआत होती है.
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-82)
प्रथम आंग्ल-मराठा संघर्ष लगभग 7 वर्ष तक चलता है. इसकी शुरूआत 18 मई 1775 को अरास नामक जगह पर होती है, जहां मराठा एवं अंग्रेजी सेना के बीच युद्ध से होता है, जिसमें मराठे परास्त हुए और सालसेट पर अधिकार कर लिया.
परंतु उसी समय बंगाल के गवर्नर जनरल की काउंसिल ने सूरत की संधि को अस्विकार करते हुएमराठों के विरूद्ध चल रहे युद्ध को बंद करने का आदेश दिया क्योंकि यह संधि रेग्यूलेटिंग एक्ट के विरूद्ध थी तथा इसके चलते कंपनी को अनावश्यक युद्ध में भाग लेना पड़ा general knowledge in indian history.
उसके बावजूद भी वे युद्द बंद नहीं हुआ. बंगाल काउंसिल ने कर्नल आप्टन को मराठों से बातचीत के लिए भेजा परंतु आप्टन एवं मराठों के बीच रघुनाथ राव को लेकर मतभेद हो गया. मराठे चाहते थे कि रघुनाथ राय को कंपनी उन्हें सौंप दे जबकि आप्टन इस बात पर तैयार नहीं था.
साथ ही आप्टन सालसेट व बमीन पर अधिकार बनाए रखना भी चाहता था, अतः वार्ता असफल हो गई general knowledge in indian history.
पुरंदर की संधि
प्रथम आंग्ल-मराठा संघर्ष (1775-1782) के बीच संधि करने के बहुत प्रयास हुए परंतु सफलता नहीं मिली. 1776 ई. में दोनों पक्षों ने पुरंदर में बातचीत की, जिसे पुरंदर की संधि कहा गया, इस पर संधि मराठों की ओर से सुखाराम बापू तथा ब्रिटिश की तरफ से कर्नल आप्टन अधिकृत रूप से बात कर रहे थे. इसी संधि को ‘पुरंदर की संधि’ कहा जाता है. इस संधि की महत्वपूर्ण शर्ते इस प्रकार थी-
- कंपनी ने माधवराव नारायण राव द्वितीय को पेशवा और नाना फड़नवीस को उसका संरक्षक मान लिया
- अंग्रेजों ने रघुनाथ राव (रपोबा) को युद्द में लिए समर्थन के लिए जो राशि खर्च की है, उसके लिए मराठा अंग्रेजों
- को 12 लाख रुपये देंगे,
- सूरत की संधि को रद्द कर दिया गया.
- मराठों ने रपोबा को 3 लाख 15 हजार रुपये वार्षिक पेंशन देना स्वीकार कर लिया.
- रघोचा कोई सेना नहीं रखेगा तथा गुजरात के कोपरगांव में जा कर रहेगा.
- कंपनी ने मराठों से सालसेट एवं बसीन को प्राप्त किए थे, कंपनी के पास ही रहेंगे.
परंतु कुछ महीने शांति रहने के बाद दोनों पक्षों में फिर से वुद्ध आरंभ हो गए, जनवरी 1779 में पूना के निकट तेलगांव में भयंकर युद्ध हुआ general knowledge in indian history in Hindi.
जिसमें मराठा सेना ने ब्रिटिश सेना को बुरी तरह से परास्त कर दिया और अंग्रेज बड़गांव की अपमानजनक संधि करने पर मजबूर हो गए, इस संधि की शर्तों के अनुसार कंपनी रघोचा को मराठों के हवाले करेगी तथा कंपनी ने अबतक जिन मराठा प्रदेशों पर अधिकार किया था, वे मराठों को सौंप देंगे. कंपनी जब तक शर्तें न. पूरा करे तब तक दो अंग्रेज अधिकारी बंधक के तौर पर मराठों की कैद में राहेंगे,
यह ( general knowledge in indian history in Hindi )संधि अंग्रेजों के लिए घोर अपमानजनक थी. वारेन हेस्टिंग ने इसे स्वीकार नहीं किया तथा मराठों के खिलाफ दो अलग-अलग सेना भेज दी, जिनमें से एक का नेतृत्व कर्नल पोफम कर रहा था, वहीं दूसरी सेना का नेतृत्व कर्नल मॉडर्ड कर रहा था.
जब नाना फड़नवीस को यह खबर मिली तो उसने हैदराबाद के निजाम और मैसूर के हैदर अली को अपने साथ मिलाया किंतु वारेन हेस्टिंग ने निजाम को कूटनीति से अलग कर दिया, कर्नल गॉडर्ड अहमदाबाद एवं बसीन पर अधिकार करते हुए 1780 में बड़ौदा पहुंचा और वहां से पूना की ओर प्रस्थान किया किंतु पूना के निकट मराठों ने उसे काफी क्षति पहुंचाई इधर कर्नल पोफम अगस्त ने 1780 में ग्वालियर वर्ग पर अधिकार कर लिया.
उसके बाद सित्री नामक स्थान पर महादजी सिंधिया ने कर्नल पोफम को बुरी तरह से परास्त किया, इधर दूसरी तरफ हैदर अली ने कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया, इसके बाद अंग्रेज निरंतर हारने लगे, जिसके कारण उनका मनोबल गिरने लगा, ऐसी परिस्थिति को देखते हुए वारेन हेस्टिंग ने एंडरसन को मराठों से संधि करने के लिए भेजा, हेस्टिंग ने एंडरसन और नान फड़नवीस को जो पत्र लिखा है, उससे स्पष्ट होता है कि हेस्टिंग संधि करने के लिए बहुत व्यग्र था.
सालवाई की संधि
17 मई 1782 को अंग्रेजों एवं मराठों के बीच सालबाई की संधि हुई. इस संधि की प्रमुख रातें इस प्रकार हैं.
- अंग्रेजों ने रघोचा का साथ छोड़ने का आश्वासन दिया तथा मराठे रघोचा को 25 हजार रुपये की मासिक पेंशन देंगे.
- सालसेट तथा भड़ौच को छोड़कर कंपनी सभी अधिकृत मराठा प्रदेशों पर अपना अधिकार छोड़ने के लिए सहमत हो गई.
- कंपनी ने माधव राव नारायण राव द्वितीय को पेशवा तथा फतेह सिंह गायकवाड़ को बड़ौदा का शासक स्वीकार कर लिया.
- इस संधि के स्वीकृति के 6 महीने के भीतर मैसूर शासक हैदर अली जीते हुए प्रदेशों की लौटा देगा.
इस संधि पर महादजी सिंधिया और नाना फड़नवीस के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए क्योंकि नाना फड़नवीस का मित्र हैदरअली अभी भी अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध मैदान में था. अतः अंग्रेजों से संधि करना हैदर अली के साथ विश्वासपात जैसा था. जब 7 दिसंबर 1782 को हैदर अली की मृत्यु हो गई, तब नाना फड़नवीस ने 20 दिसंबर 1782 को इस संधि पर हस्ताक्षर किया,
प्रथम आंग्ला-मराठा वृद्ध का परिणाम
सामान्य तौर पर सालबाई की संधि की शर्ते मराठों के पक्ष में दिखाई पड़ती हैं. इसके बाद लगभग 20 वर्ष तक मराठो एवं अंग्रेजों के बीच शांति बनी रही general knowledge in indian history in Hindi.
इस संधि से पेशवा एवं महादजी सिंधिया का महत्व बढ़ गया, यहां तक कि महादजी सिधिया को अंग्रेजों ने आश्वासन दिया कि वो मुगल बादशाह शाह आलम के मामले में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, परन्तु विशेष तथ्य यह है कि इस संधि के द्वारा अंग्रेजों ने मराठे एवं मैसूर की मित्रता समाप्त कर दी.
मैसूर का शासक मराठा सहायता नहीं प्राप्त कर सका. हालांकि हैदर अली के मरने के बाद भी उसके बेटे टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष को जारी रखा किंतु मराठों की ओर से उसे कोई सहायता नहीं दी गई.
अंग्रेजों ( general knowledge in indian history )ने मैसूर को पराजित करके दक्षिण भारत में कंपनी का प्रभुत्व स्थापित कर दिया, अतः सालबाई के संधि के द्वारा अंग्रेजों ने अपने को भारतीय शक्ति के सामूहिक विरोध से बचा लिया तथा दूसरी तरफ भारतीय शक्ति को विभाजित करने में भी सफलता प्राप्त कर ली
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1798-1805)
लाई बेलेकली (1798-1805) को बंगाल का गर्वनर जनरल नियुक्त किया गया, उस समय अंग्रेजों को फ्रांसीसियों से भी भय था, जो अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध मदद किए थे, वेलेजली ने सहायक संधि की प्रणाली का विकास किया, जिसके माध्यम से वह समस्त भारतीय राज्यों पर कंपनी का प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था और इसी क्रम में वो मराठों को भी सहायक संधि के जाल में फंसाना चाहता था.
general knowledge in indian history in hindi दूसरी तरफ पेशवा माधवराव नारायणराव द्वितीय की 1796 में मृत्यु हो गई. जिसके बाद रघोबा का पुत्र बाजीराव द्वितीय (1796-1818) मराठा साम्राज्य का अंतिम पेशवा बना .
पेशवा के उत्तराधिकार के विवाद ने पूरे मराठा साम्राज्य को ही उलझा कर रख दिया. चाजीराव द्वितीय प्रधानमंत्री नाना फड़नवीस को पसंद नहीं करता था और उससे आजादी चाहता था. इसी बीच 1800 ई. में नाना फड़नवीस की मृत्यु होगई. कहा जाता है कि नाना की मृत्यु के साथ ही मराठाओं में नेतृत्व एवं सूझबूझ समाप्त हो गया.
बाजीराव द्वितीय ने खुद मराठा सरदारों के मध्य झगड़े और षड़यंत्र करवाए परंतु खुद भी उसमें उलझ गया. दौलत राव सिंधिया एवं जसवंत होल्कर दोनों ही पूना में अपना प्रभुत्व जमाना चाहते थे. जिसमें सिधिया सफल रहा तथा बाजीराव द्वितीय के समर्थन में आ गया. यशवंत राव होल्कर ने मत्हाव राव होल्कर की हत्या करके उसके पुत्र को बंदी बना लिया.
1801 में पेशवा बाजीराव द्वितीय ने यशवंत राव होल्कर के भाई की हत्या कर ती. यशवंत राव ने पूना पर आक्रमण कर दिया तथा सिंधिया और पेशवा को संयुक्त रूप से पराजित किया और पूना को अपने अधिकार में ले लिया. उसने अमृतराव के बेटे विनायक राव को पूना की गद्दी पर बैठा दिया general knowledge in indian history.
बाजीराव द्वितीय ने भागकर बेसिन में शरण ली और अंग्रेजों से मदद की गुहार लगाई. 13 दिसंबर को पेशवा बाजीराव और अंग्रेजों के बीच एक सहायक संधि हुई. जिसे ‘बेसिन की संधि’ के नाम से जाना जाता है. विदित हो कि इससे पूर्व कंपनी हैदराबाद के निजाम से सहायक संधि कर चुकी थी तथा मैसूर को पूरी तरह से शक्तिहीन कर चुकी थी.
इस संधि के अनुसार पेशवा निम्न शर्तों को मानने के लिए तैयार हो गए थे
- 6000 अंग्रेजी सैनिक पेशवा की सहायता के लिए तैनात किए जाएंगे, जिसका खर्च 26 लाख रुपये प्रति वर्ष धा,
- पेशवा इतने ही वार्षिक आय का भूभाग अंग्रेजों के देगा. साथ ही अपने दरबार में एक अंग्रेज रेजिडेंट नियुक्त करेगा,
- पेशवा अंग्रेजों की अनुमति के बिना किसी भी अन्य यूरोपियन को अपने राज्य में न तो नियुक्त करेगा और न ही रहने की आज्ञा देगा.
- पेशवा हैदराबाद के निजाम एवं बड़ौदा के गायकवाड़ के साथ अपने विवादों में कंपनी की मध्यस्थता स्वीकार करेगा
- पेशवा सूरत से अपना अधिकार छोड़ देगा,
- पेशवा कंपनी की अनुमति के बिना किसी भी देसी राज्य के साथ युद्ध या संधि नहीं करेगा.
बेसिन की संधि के द्वारा कंपनी को मराठों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिल गया. पेशवा ने मराठों के सम्मान एवं स्वतंत्रता को कंपनी के हाथों में बंधक रख दिया. मराठों के लिए यह राष्ट्रीय अपमान से कम नहीं था. दूसरी तरफ इस संधि ने ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए अनुकूल परिस्थियां उत्पन्न कर दी.
कंपनी ने बाजीराव द्वितीय को सेना के संरक्षण में पूना भेजकर गद्दी पर तो बैठा दिया परंतु मराठा सरदार इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं थे. मराठा सरदार आपस में एकता का प्रयास करने लगे general knowledge in indian history.
गायकवाड़ अंग्रेजों का मित्र था, इसलिए उसने अंग्रेज विरोधी संघ में शामिल होने से इंकार कर दिया परंतु सिंधिया और भोसले एक हो गए. होल्कर भी सिंधिया से व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण इसमें शामिल नहीं हुआ. अतः सिंधिया और भोसले अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध की तैयारी शुरू कर दी general knowledge in indian history.
उधर लाई वैलेजली ने एक सेना अपने भाई आर्थर वैलेजली तथा दूसरी सेना जनरल लेक के नेतृत्व में मराठों के खिलाफ भेज दी. आर्थर वैलेजली ने अहमदनगर जीतते हुए अजंता एवं एलोरा के निकट असाई नामक स्थान पर सिंधिया एवं भोंसले की संयुक्त सेना को पराजित किया फिर असीरगढ़ एवं अरगाव में भी परास्त किया.
17 दिसंबर 1803 को रघु जी भोसले एवं अंग्रेजों ( general knowledge in indian history. ) के बीच गेवगांव की संधि होती है. इस संधि की रातों के अनुसार-भोंसले ने कटक एवं वर्धा नदी के तटवर्ती क्षेत्र कंपनी को दे दिए, अपनी सेवा से सभी विदेशियों को निकाल दिया
निजाम एवं पेशवा के साथ मतभेद सुलझाने के लिए कंपनी की मध्यस्थता स्वीकार करेगा, भोंसले ने अंग्रेजों की सहयक संधि की सभी शर्तों को मान तो लिया, किंतु राज्य में कंपनी की सेना रखने की शर्त स्वीकार करने से मना कर दिया. वैलेजली ने भी इसपर ज्यादा दबाव नहीं दिया general knowledge in indian history in hindi.
उधर जनरल लेक ने उत्तर भारत के अलीगढ़ से अपनी विजय शुरू करते हुए दिल्ली और फिर भरतपुर पर आक्रमण किया. भरतपुर के बाद आगरा पर आक्रमण किया और अंत में लासवाड़ी नामक जगह पर सिंधिया को हराकर 30 दिसंबर 1803 ई. को सिंधिया से सूरजी-अर्जनगांव की संधि’ की. इस संधि की शतों के अनुसार-
- गंगा एवं यमुना के बीच का क्षेत्र कंपनी को दे दिया गया.
- बुंदेलखंड और अहमदनगर का दुर्ग, भढौच, अजंता घाट भी कंपनी को दे दिए गए,
- अपने दरवार में ब्रिटिश रेजिडेंट रखना स्वीकार कर लिया.
- सिंधिया को 6 बटालियन की सेना दी जाएगी जिसका खर्च उसके द्वारा दिए गए भू-क्षेत्र से प्राप्त राजस्व से पूरा किया जाएगा.
- अंग्रेजों की अनुमति के चिना किसी भी यूरोपियन को नहीं रखा जाएगा.
इस प्रकार सिंधिया और भोंसले ने भी बेसिन की संधि को स्वीकार कर लिया. इस सफलता से उत्साहित कंपनी ने घोषणा कर दी कि युद्ध के प्रत्येक उद्देश्य को प्राप्त कर लिया गया है, परंतु होल्कर, जो अंत तक इन घटनाओं से अलग था general knowledge in indian history.
उसने अप्रैल 1804 ई. में राजस्थान में कंपनी के मित्र राज्यों पर आक्रमण कर दिया. हालांकि शुरूआत में होल्कर को कुछ आरंभिक सफलता मिली परंतु बाद में वैलेजली के निर्देश पर आर्थर बैलेजली के नेतृत्व में दक्षिण से तथा कर्नल मेर के नेतृत्व में गुजरात की ओर से होल्कर के राज्यों पर आक्रमण किया गया.
बाद में एक और सेना कर्नल मान्सन के नेतृत्व में राजपूताने की ओर से भेजी गई और अंततः होल्कर को पराजित होना पड़ा. 25 दिसंबर 1805 को
- “राजपुर घाट संधि’ करनी पड़ी. इस संधि की शर्तों के अनुसार-
- चंचल नदी के उत्तरी प्रदेश, बुंदेलखंड छोड़ दिए गए,
- अपनी सेवा में किसी यूरोपियन की नियुक्ति नहीं करना,
- इसके बदले मालवा और मेवाड़ पर होल्कर का अधिकार मान लिया गया
इस प्रकार से यह द्वितीय आंग्ल-मराठा संघर्ष का अंत था. लार्ड वेलेजली भी वापस इंग्लैंड चले गए ( general knowledge in indian history in Hindi)और उनकी जगह सर जार्ज बालों को भेजा गया. इस युद्ध के अंत तक कंपनी भारत में सर्वश्रेष्ठ शक्ति के रूप में स्थापित हो गई.
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-18)
तृतीय आंग्ल-मराठा संघर्ष की शुरुआत लाई हेस्टिंया के कार्यकाल में हुआ, जो 1813 में कंपनी का गर्वनर जनरल नियुक्त हुआ. हेस्टिंग्स ने मराठों के अनियमित सैनिक, जिनको पिण्डारी कहा जाता था, उनके खिलाफ अभियान से शुरू हुआ. पिण्डारी मालवा एवं राजस्थान के गावों में लूटपाट किया करते थे.
हेस्टिंग्स के अभियान से मराठा प्रभुत्व को चुनौती मिली हेस्टिंग्स ने भोसले (1816), पेशवा (1817) तथा सिंधिया (1817) को बहुत अपमानजनक संधि करने के लिए बाध्य किया.
इससे विवश होकर पेशवा ने विद्रोह कर दिया. सभी मराठा अपमान की आग में जल रहे थे. पेशवा ने किंकी की रेजिडेंसी पर आक्रमण कर जला दिया परंतु अंत में पराजित हुआ और उसे पीछे हटना पड़ा, पेशवा भागकर सतारा गया संतु वहां से भी उसे भागना पड़ा और पहले कोरेगांव और उसके बाद 20 फरवरी 1818 को आस्थी में उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा, जून 1818 में उसने आत्मसमर्पण कर दिया.
इसके बाद कंपनी ने पेशवा का पद ही समाप्त कर दिया और उसके संपूर्ण राज्य पर अपना अधिकार जमा लिया. पेशवा को 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर कानपुर के नजदीक बिटूर नामक स्थान पर भेज दिया गया. पेशवा के सहायक त्रिंबक जी को भी पकड़कर चनार के किले में जीवनपर्यंत के लिए कैद रखा गया.
( general knowledge in indian history top 100 )एक-एक करके अन्य मराठा सरदार भोंसले और होल्कर को भी युद्द में पराजित करके शक्तिहीन बना दिया गया. सिंधिया और गायकवाड़ तो युद्ध में भाग लेने का साहस तक नहीं कर सके, मराठा संघ समाप्त हो गया और उसके साथ ही भारत में अंग्रेजी शक्ति का मुकाबला करने वाली अंतिम शक्ति का भी अंत हो गया,
अंग्रेजों ने नाममात्र के लिए शिवाजी के एक वंशज प्रताप सिंह को सतारा का राजा बना दिया परंतु उनमें अंग्रेजी सत्ता के विरोध का कोई साहस नहीं था. प्रिंसेप के अनुसार, ” अंग्रेजी प्रभाव और सत्ता जादू की तरह भारत में फैल गई.” इस प्रकार भारत की राजसत्ता के लिए अंग्रेजों से हुआ संघर्ष समात्र हो गया.
मराठों के पतन का कारण
मुगल साम्राज्य के पतन के बाद भारत में शीघ्रता से मराठों ने प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया, मराठे संपूर्ण भारत पर शासन तो नहीं स्थापित कर सके परंतु संपूर्ण भारत उनसे आतंकित था general knowledge in indian history Top 500.
वे भारत के सभी भागों से चौथ और सदेशमुखी वसूलते थे. बंगाल और पंजाब के अलावा राजस्थान, अवध, हैदराबाद, कर्नाटक, मैसूर आदि के शासक उन्हें कर देते थे. गुजरात, मालवा, बुंदेलखंड, महाराष्ट्र आदि उनके अधीन थे. मुगल बादशाह तक उनके पेंशनर थे. उस समय मराठे ही भारत में सबसे शक्तिशाली माने जाते थे.
मराठों की यह शक्ति जिसने पूरे भारत को रौद लिया था, अंग्रेजों के सामने कमजोर पड़ गई. प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध वारेन हेस्टिंग के समय, दूसरा आंग्ल-मराठा बद्ध लाई वेलेजली तथा तीसरा लाई हेस्टिंग्स के कार्यकाल में हुआ. तीसरे व अंतिम संघर्ष के परिणाम स्वरूप पेशवा का पद समाप्त करके कंपनी का पेंशनर बना दिया गया.
मराठा राज्यों में अंग्रेजी सेनाएं नियुक्त कर दी गई आंतरिक व विदेश नीति कंपनी के अधिकारी तय करते थे. अतः संपूर्ण भारत में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने वाले मराठा अंग्रेजों के अधीन हो गए, मराठा साम्राज्य के पतन को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत हैं general knowledge in indian history.
जानेमाने इतिहासकार डॉक्टर तारा चंद के अनुसार 1761 ई. में हुए पानीपत के तृतीय युद्ध से बहुत पहले ही मराठों के पतन के कारण विद्यमान थे, जबकि डॉक्टर जदुनाथ सरकार ने पानीपत के तृतीय युद्द की पराजय को मराठों के पतन का कारण बताया.
डॉक्टर एम. एन सेन के अनुसार मराठा साम्राज्य की प्रगति में ही उसके पतन के कारण निहित है. मराठों की तीव्र प्रगति ने उन्हें आपस में विभाजित कर दिया, जो उनके पतन का मुख्य कारण बना general knowledge in indian history.
प्राण्ट डफ और सरदेसाई भी पानीपत के तृतीय युद्ध की पराजय को मराठों के पतन का मुख्य कारण मानते हैं. सरदेसाई के अनुसार पेशवा माधवराव प्रथम की मृत्यु के समय से मराठों का पतन शुरू हो गया था. आंग्ल-मराठा संघर्ष में मराठों के पराजय के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-
मराठों के आंतरिक मतभेद
मराठा साम्राज्य एक राज्य न होकर संघ राज्य था. जिसमें शक्तिशाली मराठा सरदार स्वतंत्र व्यवहार करते थे. उनमें एकता का पूर्ण अभाव था. जैसे-जैसे पेशवा कमजोर होते गए, मराठा संघ बिखरता बला गया, सिंधिया, होल्कर, गायकवाड़ और भोसले जैसे मराठा सरदार आपस में ही लड़ते रहे और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे के विरुद्ध अंग्रेजों की मदद लेने से भी परहेज नहीं करते थे,
अतः अंग्रेजों को मराठों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने तथा उन्हें कमजोर करने का अवसर मिल गया, पूना दरचार के झगड़े का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध में भाग लिया था. अतः मराठों का पारस्परिक संघर्ष, एकता का अभाव और केंद्रीय राज्य की कमी सबसे बड़ी कमजोरी थी. 1.9.2- मराठा शासन व्यवस्था का दोष
मराठा राज्य के राजनीतिक एवं प्राशासनिक व्यवस्था में भारी दोष थे. मराठों ने कभी भी आम नागरिकों की शिक्षा, रक्षा, सामुदायिक विकास, भौतिक उन्नति का कोई प्रयत्न नहीं किया, उन्होंने जनता के एकीकरण का भी कोई प्रयास नहीं किया, उनका कार्य धन लूटना और अपनी शक्ति को स्थापित करना भर था general knowledge in indian history.
लूटमार एवं उत्तर भारत से प्राप्त होने वाली धन-संपत्ति ने उन्हें विलासप्रिय बना दिया था. उनके सरदारों का भी नैतिक पतन हो चुका था. जिस नागरिक समाज ने मुगल साम्रज्य से संघर्ष में विशेष भूमिका निभाई थी, आंग्ल-मराठा संघर्ष में उदासीन बने रहे general knowledge in indian history in hindi.
राजनैतिक दूरदर्शिता का अभाव
मराठा सरदारों में राजनीतिक दूरदर्शिता का स्पष्ट अभाव दिखाई देता है. मराठों ने कभी भी पतन की ओर अग्रसर हो रहे मुगल साम्राज्य पर अपना दावा नहीं किया, वे चाहते तो मुगल बादशाह को हटाकर छत्रपति या पेशवा को भारत का सम्राट बना सकते थे general knowledge in indian history top 100.
उस स्थिति में मराठों के नेतृत्व में भारत की एकता संभव थी, परंतु मराठों ने एक राजनीतिक गुट की तरह केवल मुगल बादशाह को अपनी कठपुतली बनाने में अपनी सफलता समझ ली थी. general knowledge in indian history in Hindi यदि मराठे दिल्ली के सम्राट बनते तो अंग्रेजों के खिलाफ सभी छत्रपों एवं राज्यों को एक साथ ला सकते थे.
अयोग्य नेतृत्व
किसी भी राजनैतिक व्यवस्था में उसके नेतृत्त्व की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है. 18वीं सदी के अंत तक महादजी सिंधिया, अहिल्याबाई होल्कर, पेशवा माधव राव, तुको जी होल्कर तथा नाना फड़नवीस जैसे योग्य मराठा सरदारों की मृत्यु हो चुकी थी general knowledge in indian history.
पेशवा बाजीराव द्वितीय, दौलत राव सिंधिया तथा जसवंत राव होल्कर जैसे सरवारों का नेतृत्व पूरी तरह से दुर्बल एवं स्वाथों से भरा था. यह आपस में ही संघर्ष करते थे. इनका नैतिक रूप से पतन हो चुका था. जनता इनके लूट, कुशासन और उत्पीड़न से त्रस्त हो चुकी थी.
दूसरी तरफ आंग्ल सेना के पास एलफिस्टन, माल्कम, आर्थर बैलेजली, जनरल लेक, लार्ड वेलेजली जैसा योग्य राजनीतिक एवं सैन्य नेतृत्व प्राप्त था. मराठों के अयोग्य नेता कूटनीति, कौशल एवं युद्ध क्षेत्र में अंग्रेजों के सामने ठहर नहीं पाए general knowledge in indian history in Hindi Most Important Questions.
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