ravigyan मुगल वंश के पतन में औरंगजेब की भूमिका 2

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1.4.1 मुगल वंश के पतन में औरंगजेब की भूमिका ravigyan


इतिहास में भेद-भाव के लिए कोई जगह नहीं है। इसका सीधा-सादा फैसला यही है कि औरंगजेब के प्रपितामह अकबर ने जो विशाल साम्राज्य स्थापित किया था, उसे उसने व्यावहारिक तौर पर लगभग विखण्डित कर दिया था। साम्राज्य का अपकर्ष उसके शासनकाल से ही शुरू हो गया था और उसकी अदूरदर्शी नीतियों ने मुगल शासन की नींव कमजोर कर दी थी।

अपनी धर्मान्ध नीतियों के चलते उसने न केवल कत्लेआम मचाया बल्कि अपनी हिन्दू प्रजा पर अनुदार नीतियों लागू की और इन्हें उचित ठहराने के लिए नए-नए तर्क भी दिए। इसके परिणामस्वरूप, आजीवन भारत पर शासन करने के उसके प्रयास का अन्त अव्यवस्था और क्षोभ के रूप में हुआ। ravigyan


राजधानी में आए दिन औरंगजेब की गैर-मौजूदगी से उन अवसरवादियों को पनपने का मौका मिला जो मुगलों को सत्ता से हटाने के लिए कटिबद्ध थे। इस आखिरी कुशल मुगल बादशाह को अनेक विद्रोहों का सामना करना पड़ा और इन विद्रोहों ने मुगल साम्राज्य की नींव हिला दी थी। ravigyan

आगरा में जाट विद्रोह पर उतारू थे तो दक्षिण में छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व में स्वराज की कल्पना को बढ़ावा मिल रहा था। मराठों, जाटों और राजपूतों के प्रति औरंगजेब के सख्त जमीनी रवैये की वजह से इन विद्रोहों को बल मिला। औरंगजेब ने इन्हें क्षेत्रीय स्वायत्तता देने से इन्कार कर दिया था। ravigyan

औरंगजेब के सत्तावादी रवैये और पूरी तरह केन्द्रीयकृत प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ बुन्देलों और सतनामियों के विद्रोह को दबाना भी कठिन हो रहा था। ( ravigyan )
इसमें कोई शक नहीं है कि औरंगजेब एक महत्वांकक्षी शासक था और वह अपने साम्राज्य की भौगोलिक सीमाएं बढ़ाने को आतुर था। हालांकि इसके लिए उसे जन-धन की भारी हानि उठानी पड़ी थी।

वह अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिए अच्छी और भरोसेमन्द संधिया करने में पूरी तरह असफल रहा था तथा उसके शत्रुओं की संख्या बढ़ती जा रही थी। आमतौर पर बीजापुर और गोलकुन्डा पर औरंगजेब की विजय को सुन्नियों पर विजय के रूप में देखा जाता है. लेकिन अपने इस कृत्य से उसने एक ऐसी मजबूत बाधा को हटा दिया था जो मराठों की बढ़ती शक्ति को रोक सकती थी। ravigyan

अपनी शंकालु प्रवृत्ति के कारण वह शासन के सारे अधिकारों को अपने हाथ में लेकर निरंकुश बन गया था और इस वजह से कुलीन तथा उच्चवर्ग के अधिकारी उससे काफी नाराज थे। औरंगजेब की निरंकुशता से सही मायनों में कुलीनवश ही सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ था क्योंकि उनका दर्जा और अधिकार सभी लगभग छीन लिए गए थे। ravigyan


औरंगजेब को पहले से ही अंदेशा था कि सत्ता के लिए उसके पुत्रों में खूनी संघर्ष होगा और इससे टालने के लिए उसने साम्राज्य को उनमें चार बराबर भागों में बांट दिया था। लेकिन उसकी मृत्यु से पहले से गृहयुद्ध शुरू हो गया और अन्ततः बहादुर शाह प्रथम इसमें विजयी हुआ तथा मुगल उत्तराधिकारियों में सत्ता के लिए गृहयुद्ध अनिवार्य सा हो गया था। ravigyan दुश्मनी, ईष्या तथा

शहजादों के बीच प्रतिद्वन्द्रिता ने शानदार मुगलकालीन भारत के विखण्डन और प्रान्तीय शक्तियों के उभरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


1.4.2 औरंगजेब के कमजोर उत्तराधिकारी ravigyan


मुगलों की शासन व्यवस्था निरंकुश होने की वजह से यह काफी कुछ बादशाह के व्यक्तित्व पर निर्भर थी। इसलिए, बादशाहों की कमजोरी उनके प्रशासन को प्रभावित करने लगी थी।

औरंगजेब के बाद के सभी बादशाह कमजोर थे. इसलिए वे बाहरी और अन्दरूनी चुनौतियों का सामना करने में अक्षम थे। बहादुर शाह प्रथम (1702-1712) अत्यन्त वृद्ध था और साम्राज्य का गौरव बनाये रखने के काबिल नहीं था। वह सभी पक्षों को खुश रखने के लिए मुक्तहस्त से अनुदान, उपाधियाँ और ईनाम बाँटता था। ravigyan

उसके इस रवैये से वह शाह-ए-बेखबर जैसे उपनाम से जाना जाता था। उसके बाद जहाँदर शाह (1712-13) गद्दी पर बैठा, यह निहायत ही मूर्ख और बेतुके काम करने वाला बादशाह था। फारूखशियार अत्यन्त कायर था जबकि मुहम्मद शाह अपना ज्यादातर समय पशुओं की लड़ाई देखने में गुजारता था। शराब और औरत का शैकीन होने के कारण उसे “रंगीला” नाम दिया गया था। ravigyan

Ahmad Shah एय्याशी के मामले में इससे भी दो कदम आगे था ( ravigyan )उसने अपने हरम में कई-कई हफ्ते या महीने गुजार देता था। प्रशासनिक मामलों में तो उसके फैसले और भी ज्यादा मूर्खतापूर्ण होते थे। इससे साफ पता चलता है कि औरंगजेब के उत्तराधिकारी कमजोर थे और विशाल मुगल साम्रज्य को सभालना उनके वश के बाहर था।


दरवारियों में गुटबंदी ravigyan


औरंगजेब के शासन के अन्तिम वर्षों में उसके उच्च दरबारी कुलीन अलग-अलग गुटों में बंटने लगे थे और सत्ता पर दबाव डालने लगे थे। हालांकि ये गुट अपने कुल या परिवारिक रिश्तों के आधार पर बने थे लेकिन व्यक्तिगत हित या सरोकार सर्वोपरि थे। इन गुटों ने देश में निरन्तर अशान्ति बनाए रखी।

इन गुटों में एक प्रमुख गुट तूरानियों अथवा मध्य एशियाई कुलीनों का था, मुहम्मद शाह के शासनकाल में आसफ जाह, निजाम-उल-मुल्क, कमरूद्दीन और जकारिया खान इस तूरानी गुट के प्रमुख नेता थे। जबकि परिशयाई गुट के प्रमुख नेता अमीर खान, इशाक खान और सादत खान थे। इन गुटों ने अपने-अपने लोगों को शामिल किया था। ravigyan

जिनमें ज्यादातर मध्य एशिया या परशिया से थे। मुगल या विदेशी गुटों के रूप में कहे जाने वाले इन दोनों गुटों ने हिन्दुस्तानी गुटों, उस काल के दौरान जिनके नेता सईद अब्दुल्ला खान और सैय्यद हुसैन अली जो सैय्यद बन्धु के रूप में प्रसिद्ध थे, के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। सैयद बन्धुओं को हिन्दुओं का समर्थन प्राप्त था। ravigyan

प्रत्येक गुट अपने आप को बादशाह का हितैषी बताता था और एक दूसरे के खिलाफ बादशाह के कान भरता था। देश में शान्ति व्यवस्था को भंग करने वाले इन गुटों में संघर्ष होता रहा और प्रशासन की अनदेखी होती रही। विदेशी आक्रमणों के समय भी ये एकजुट नहीं हो सके, यहाँ तक कि कई बार इन्होंने विदेशी हमलावरों के साथ षडयंत्र भी रचा।

निजाम-उल-मुल्क (किलिच खान) और बुरहान-उल-मुल्क (सादत खान) व्यक्तिगत हितों के चलते नादिर शाह के साथ पंडयन्त्र में भी शामिल हुए। ravigyan

18वीं सदी में नए-नए राजनीतिक महत्त्वाकांक्षियों को क्षेत्र, धर्म और धर्मान्धता के आधार पर छोटी-छोटी स्थानीय रियासते गढ़ने या मौका मिला। 18वीं सदी ने इन्हें संसाधनों को फिर से जुटाने और सैन्य विस्तार के व्यापक जरिए उपलब्ध कराए।

वही दूसरी तरफ, अंग्रेजी की ईस्ट इंडिया कम्पनी जैसे विदेशी व्यापारियों, जो विस्तार तथा अपनी धन-दौलत बढ़ाने के किसी भी अवसर को छोड़ना नहीं चाहते थे. इस सदी ने आधिपत्य और दमन के एक बड़ा भू-भाग उपलब्ध कराया। ravigyan


सी.ए. बायली और आन्द्रे विंक जैसे इतिहासकारों का तर्क है कि अस्त होते मुगल साम्राज्य में नए राज्यों का उदय कोई नई घटना नहीं थी. यह तो विस्तार और विकास की पहले से मौजूद प्रक्रिया की पूर्णता को दर्शा रहा था और दुलमुल मुगल व्यवस्था इसे रोक नहीं सकती थी।

ऐसे कई उदाहरण है, जहाँ आर्थिक कायापलट का लाभ उठाने वाले खुद शासक बन बैठे थे और एक दूसरे को जीतने और दमन की रस्साकसी में उलझे हुए थे। स्थानीय भावना से ओत-प्रोत इन शासकों ने प्रशासनिक शक्तियों अपने हाथ में ली और सैन्य विस्तार की नीतियों का अनुसरण किया। ravigyan

इन नीतियों के तात्कालिक परिणामस्वरूप राजस्व वसूलने और राजस्व व्यवस्था के नए-नए तरीके लागू किए गए। डेविड वाशब्रुक ने इन्हें ‘सैन्य वित्तवाद” का नाम दिया है।

मुगल सत्ता के खिलाफ स्थानीय क्षत्रपों, जमीदारों और कृषकों की बगावत ने मराठा, अफगान, जाट और पंजाब राज्यों को जन्म दिया। इन दोनों प्रकार के राज्यों या क्षेत्रों में राजनीति का स्वरूप कुछ सीमा तक अलग-अलग था और साथ ही स्थानीय परिस्थितियों की वजह से इन सभी में परस्पर विवाद भी थे। इसके बावजूद. इन राज्यों ने प्रशासन के अनेक क्षेत्रों में मुगल संस्थाओं और व्यवस्थाओं को बनाए रखा।

उत्तराधिकार राज्यों और बागी राज्यों के अलावा, राजपूताना, मैसूर और त्रावणकोर जैसे कुछ अन्य राज्य भी थे जिन्हें विगत में काफी स्वायत्तता प्राप्त थी और 18वीं सदी में ये राज्य पूरी तरह से स्वतंत्र हो गए थे।ravigyan


मराठा


औरंगजेब की मृत्यु के बाद, इसके दूसरे पुत्र और राजगद्दी के दावेदार आजम ने शिवाजी के प्रपौत्र और सम्भाजी के पुत्र साहू को कैद से आजाद कर दिया। 1689 में Sambhaji को फांसी द्वारा मौत के बाद साह को गिरफ्तार करके Mughal दरबार में हाजिर किया गया था। जनवरी 1708 में सतारा ravigyan पहुँचने पर साहू जी का राज्यभिषेक किया गया।

सम्भाजी की मृत्यु के बाद मराठों का संचालन सम्भाजी के सौतेले भाई राजाराम ने सम्भाला और वे आखिरी सांस तक मुगलों के खिलाफ संघर्ष करते रहे। उनकी विधवा ताराबाई जो एक सशक्त और दबंग महिला थी, ने अपने पुत्र की तरफ से स्वयं को प्रतिशासक घोषित कर दिया। ravigyan

ऐसे समय में साहू के आगमन से मराठा क्षत्रप दुविधा में पड़ गए जिसकी वजह से गृहयुद्ध की शुरूआत हुई। एक शीर्ष मराठा अधिकारी, बालाजी विश्वनाथ की सहायता और सलाह से Sahu विजयी हुए। Balaji विश्वनाथ की अमूल्य सेवाओं का सम्मान करते हुए साहू ने 1713 में उसे ( ravigyan )पेशवा यानि प्रधानमंत्री का पद दिया।

अब से छत्रपति केवल मराठों का नाममात्र का शीर्ष पद रह गया। बाला जी विश्वनाथ ने अपनी योग्यता और कुशल प्रशासन क्षमता से पेशवाई को वंशानुगत बना दिया। सैय्यद बंधुओं के साथ एक समझौते के जरिए साहू को शिवाजी के गृह राज्य के राजा के रूप में मान्यता मिल गई और उन्हें दक्षिण में मुगलों के छः सूबों से चौथ तथा सरदेशमुखी वसूलने की अनुमति भी मिल गई।
उसके पुत्र और पेशवा पद के उत्तराधिकारी, बाजीराव ने मराठा शक्ति को चरम पर पहुँचा दिया था। सभी के साझा दुश्मन मुगलों के खिलाफ हिन्दु क्षत्रपों का सहयोग प्राप्त करने के लिए उसने हिन्दु पद पादशाही की विचारधार को प्रचारित और लोकप्रिय किया। ravigyan

Shivaji के बाद बाजीराव को गुरिल्ला युद्ध कला का महान महारथी माना जाता है। बाजीराव जिन्हें नाना साहिब नाम से प्रसिद्धि मिली थी ने, Maratha साम्राज्य का कटक से अटक तक विस्तार कर दिया था और 1760 में दिल्ली ( ravigyan ) पर कब्जा कर लिया था। लेकिन मराठों की दिल्ली पर विजय ज्यादा समय तक नहीं टिकी और अफगानी हमलावार अहमद शाह अब्दाली के हाथों 1761 में पानीपत के युद्ध में उन्हें बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा।

अपनी हार के बावजूद उत्तरवत्ती पेशवाओं के नेतृत्व में मराठा अपने साम्राज्य के विस्तार और वृद्धि की नीति में अब भी काफी सक्रिय थे। पेशवा माधव राव के शासन में, महाद जी सिंधिया के (ravigyan ) नेतृत्व में मराठों ने 1771 में Delhi पर फिर कब्जा कर लिया। अंग्रेज-मराठा युद्ध (1776-82) में मराठाओं की प्रतिष्ठा को धक्का लगा।

इस युद्ध की परिणति सलबल की संधि (1782) के रूप में हुई। ( ravigyan ) पेशवा बाजीराव द्वितीय के पेशवाई (1798-1818) के दौरान बसाइन की एक सहायक संधि (1802) पर हस्ताक्षर हुए और इसकी वजह से अंग्रेज मराठों का दूसरा युद्ध (1803-05) हुआ। अंग्रेज और मराठों के तीसरे युद्ध (1817-18) ने मराठा शक्ति का अन्त कर दिया।

पेशवा का पद समाप्त कर दिया गया और अंग्रेजों ने बाजीराव द्वितीय को थोडी से पेंशन मंजूर करके कानपुर के नजदीक बिटूर भेज दिया। मराठों के गौरव को संतुष्ट करने के लिए सतारा के राज्य पर नाममात्र के राजा प्रताप सिंह को गद्दी पर बैठा दिया गया।

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