प्रस्तावना
16वीं ( Battle of Plassy 1757 ) सदी के मध्य और 18वीं सदी के मध्य में भारत के विदेश व्यापर में क्रमिक रूप से वृद्धि हुई। इसका कारण समय-समय पर भारत में आई अनेक विदेशी कम्पनियों की व्यापारी गतिविधियों थी।
अनन्त काल से भारत के पश्चिमी देशों से व्यापारिक रिश्ते रहे थे। लेकिन 7वीं सदी से भारत का सामुद्रिक व्यापार अरब देशों, जिनका हिन्द महासागर और लाल सागर पर वर्चस्व था, ने हथिया लिया।

भारतीय व्यापार पर अरब देशों के एकाधिकार को पुर्तगालियों ने भारत के साथ सीधे व्यापार के द्वारा तोड़ा पुर्तगालियों ने यूरोप से भारत के लिए नए समुद्री रास्ते की खोज की। कैप ऑफ गुड होप से होकर गुजरने वाले इस मार्ग की खोज वास्को दा गामा ने की थी। इस नए मार्ग से व्यापार के लिए पुर्तगालियों के अलावा अन्य यूरोपीय समुदायों ने भी पहल की Battle of Plassy।
भारत आने वाले ये व्यापारी पहले वाले व्यापारियों से बिलकुल अलग थे, इन्हें अपनी-अपनी सरकारों का राजनीतिक और सैन्य सहयोग मिला हुआ था। ये केवल व्यापारी ही नहीं थे. वे किसी न किसी रूप में अपनी-अपनी सरकारों के प्रतिनिधि भी थे, जो अपनी नौसैनिक ताकत के बल पर अपने-अपने समुद्री मार्ग बनाना चाहते थे। इत्त यूनिट में ईस्ट इंडिया कम्पनी के बताए रास्ते पर चल कर भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार और विकास पर चर्चा की जाएगी ।
- उद्देश्य
- भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का अध्ययन करना।
- बंगाल और दक्षिण में ब्रिटिश विस्तार की प्रक्रिया पर नजर डालना।
- प्लासी और बक्सर के युद्ध के बारे में स्पष्ट जानकारी लेना और भारतीय
- राजनीति पर इसके प्रभाव को समझाना।
- विदेशी अतिक्रमण के प्रतिरोध में देशी शासकों द्वारा लड़े गए युद्धों को समझना।
- अंग्रेजों और मैसूर, अंग्रेजों और मराठों तथा अंग्रेजों और सिखों के बीच संबंधों की जाँच करना।
- ब्रिटिश विस्तार के अन्य महत्वपूर्ण साधनों पर विचार करना।
- अंग्रेजी व्यापार की वृद्धि
एलिजाबेथ प्रथम के शासन काल के अन्त में अंग्रेजों ने पूर्वी देशों के साथ व्यापार में रूचि लेना शुरू कर दिया था। 31 दिसम्बर, 1600 को महारानी ने एक चार्टर पर हस्ताक्षर किए, जिसमें लदन के व्यापारियों की एक कम्पनी को मसालों के द्वीप समूह में व्यापार के लिए ईस्ट इंडीज में 15 वर्ष के लिए व्यापार के अनन्य अधिकार दिए गए।
लेकिन, 1608 में अंग्रेज सूरत पहुंचे और मुगल दरबार से और ज्यादा सुविधाओं का आग्रह किया। 1609-11 में मुगल दरबार में मौजूद विलियम हॉकिन्स पुर्तगालियों के विरोध की वजह से कुछ खास नहीं कर सका। 1612 में पुर्तगालियों की पराजय के बाद ही. जहाँगीर ने अंग्रेजों को सूरत में फैक्ट्री लगाने का फरमान जारी किया Battle of Plassy।
जहाँगीर के दरबार में 1615 से 1618 के दौरान ब्रिटिश राजदूत सर थॉमस रो ने कम्पनी के लिए अनेक सुविधाएँ प्राप्त की और 1668 में आगरा, अहमदाबाद तथा मढीच में फैक्ट्रियों लगाई। 1687 में चार्ल्स द्वितीय ने पुर्तगालियों के कब्जे वाले बम्बई को कम्पनी को सीप
दिया। अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपना मुख्यालय सूरत से शिफ्ट करके बम्बई पहुंचाया। कम्पनी ने 1611 में दक्षिण तट पर स्थित मासुलीपट्टनम (मश्लीपट्टनम) ने और 1626 में पुलीकट के समीप अमरगाँव में अपनी फैक्ट्रियों स्थापित की Battle of Plassy।
1639 में, चन्द्रगिरी के महाराज से मद्रास का पट्टा लिया और यहाँ एक किला बनाया, जो सेंट जॉर्ज के किले के नाम से जाना जाता है। इसके बाद जल्दी ही अंग्रेजों ने अपने कार्यकलाप उत्तर में भी शुरू कर दिए और उड़ीसा में हरिहरपुर और बालासोर, बंगाल में कासिम बाजार तथा हुगली में एवं बिहार में पटना में अपनी फैक्ट्रियों स्थापित की Battle of Plassy।
ब्रिटिश विस्तार के रुझान
दक्षिण में अग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच प्रतिद्वन्द्विता
यूरोप में France और Bretain के बीच राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता भारत में इनके बीच प्रतिस्पर्धा का कारण बना। 17 सदी के अन्त में और 18 वीं सदी के आरम्भ में France भारत में ज्यादा सक्रिया नहीं था ( Battle of Plassy ) और इसलिए अंग्रेजों का ध्यान इनकी तरफ नहीं गया ।
लेकिन 1720 और 1740 के बीच फ्रांसीसियों के व्यापार में अचानक तेजी आई जो अंग्रेजों के लिए चिन्ता का विषय बना। वहीं दूसरी तरफ, अस्ट्रिया में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष (1740-48) में इन दोनों देशों प्रतिद्वन्दी के रूप में शामिल होने से भी भारत में इनके बीच वैमनस्य बढ़ा।
कर्नाटक का पहला युद्ध (1746-48)
प्रथम कर्नाटक युद्ध आस्ट्रियाई उत्तराधिकार के लिए छिड़े संघर्ष के चलते यूरोप में फ्रांस और ब्रिटेन के बीच चल रहे युद्ध का विस्तार था। सितम्बर, 1746 में अंग्रेजों की नौसेना ने बारनेट के नेतृत्व में कुछ फ्रांसीसी युद्धपोतों को पकड़ लिया।
जिसे फ्रांस के गवर्नर जनरल इप्ले ने गम्भीर धमकी के रूप में लिया और मारीशस में प्रॉथ गवर्नर व्योर्दो से तुरन्त सहायता का अनुरोध किया। युद्ध में फ्रांसीसियों ने अंग्रेजी दस्ते को हरा दिया और मद्रास पर कब्जा कर लिया Battle of Plassy।
ब्रिटेन द्वारा बदले की कारवाई से पहले ही एक्स-ला-चैपल की संधि (1748) होने की खबर भारत पहुँच गई और मद्रास अंग्रेजों को लौटा दिया गया तथा दोनों के बीच शान्ति कायम हो गई Battle of Plassy।
द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749-54)
दूसरे कर्नाटक युद्ध के समय तक, डूप्ले की राजनीतिक महत्वाकांक्षा बहुत बढ़ गई थी। वह दक्षिण में देशी राजपरिवारों की राजनीति में दखल दे कर अपनी शक्तियाँ बढ़ाने लगा।
June 1748 में हैदराबाद के Nizam-उल-मुल्फ आसफ जहां की मृत्यु के ( Battle of Plassy )बाद गद्दी के लिए संघर्ष छिड़ गया। स्वर्गीय Nizam का पोता, मुजफ्फर जंग और Nizam का दूसरा पुत्र, नासिर जंग दोनों गद्दी के लिए दावेदारी पेश कर रहे थे ।
यहीं दूसरी तरफ, भूतपूर्व नवाब, दोस्त अली का दामाद चन्दा साहिब नवाब अनवरूद्दीन के अधिकार को चुनौती दे रहा था। ये क्षेत्रीय संघर्ष जल्दी ही एक संघर्ष में बदल गए और अनेक गुट बन गए।
इप्ले इस अवसर को भांप गया और कर्नाटक को फ्रांसीसियों पर निर्भर करने का सपना देखने लगा। उसने 1749 में अम्बर में नवाब अनवरूद्दीन को हरा दिया और उसकी हत्या कर दी। ( Battle of Plassy )अवैध पुत्र, मोहम्मद अली ने खुद को त्रिचनापल्ली में कैद कर लिया और अंग्रेजों से मदद की अपेक्षा की।
शेष कर्नाटक डूप्ले की कठपुतली, चन्दा साहिब के अधिकार में आ गया। 1750 में, नए निजाम नासिर जंग की हत्या के बाद, डूप्ले अपने नामिती मुजफ्फर जंग को हैदराबाद की गद्दी पर बैठाने में सफल रहा। वहीं दूसरी तरफ, मुजफ्फर जंग ने डूप्ले को कृष्णा नदी के दक्षिण में स्थित सारे मुगल भू-भाग का गवर्नर बना कर सम्मानित किया। नए निजाम के अनुरोध पर बुसी के नेतृत्व में फ्रांसीसी सेना की टुकड़ी भी हैदराबाद में तैनात कर दी गई।
इस बीच दूाले ने त्रिचनापल्ली. जहाँ मुहम्मद अली प्रश्श्रय लिए हुए था. घेरने की कोशिश की। त्रिचनापल्ली का घेरा लम्बा चला। इस बीच रॉबर्ट कलाइव ने अरकाट की राजधानी का घेरा डालकर फ्रांसीसी सेना को दो-फाड़ कर दिया Battle of Plassy।
1752 में, फ्रांसीसियों ने त्रिचनापल्ली के बाहर ब्रिटिशों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। चन्दा साहिब की धोखें से हत्या कर दी गई और उसक स्थान पर अंग्रेजों की पसंद यानि कर्नाटक के नवाब मुहम्मद अली को नया नयाब बनाया गया Battle of Plassy।
त्रिचनापल्ली में फ्रांसीसियों की हार ने इप्ले की किस्मत का दरवाजा बन्द कर दिया। फ्रेंच व्यापरी कम्पनी ने उसे वापस बुला लिया और उसके विदा होने के बाद 1735 में एक अन्तरिम संधि पर हस्ताक्षर हुए Battle of Plassy।
इस संधि के अनुसार, दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि वे भारतीय राजाओं की परस्पर लड़ाई में शामिल नहीं होंगे और संधि के समय जिन भागों पर इन पक्षों का कब्जा था चे भू-भाग उन्हीं के अधिकार में रहेंगे।
तुतीय कर्नाटक युद्ध (1758-1763)
यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध के साथ कर्नाटक का तीसरा युद्ध शुरू हुआ। 1757 में, फ्रांस सरकार ने काउन्ट दे लाली को भारत भेजा। इस बीच ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 1757 में Plassy में Bengal के नवाब सिराज-उद-दौला को हराकर Bengal पर अधिकार कर लिया था। फ्रांसीसी जनरल काउन्ट दे लाली ने June 1758 में Madras पर कब्जा कर लिया था।
अक्टूबर 1759 में सर आयर कूट के मद्रास पहुँचने पर फ्रांसीसियों के टिके रहने की उम्मीद समाप्त हो गई। 22 जनवरी 1760 को लाली की यांदीवाश की लड़ाई में निर्णायक पराजय हुई। इस लड़ाई में बुसी को कैद कर लिया गया। अंग्रेजों ने पाण्डिचेरी का घेरा डाल दिया। आठ माह तक अंग्रेजों को रोके रखने के बाद जनवरी 1761 में लाली ने समर्पण कर दिया Battle of Plassy।
पाण्डिचेरी का पतन भारत में फ्रांसीसी शक्ति के पतन की निशानी बना। पेरिस की संधि (1783) के द्वारा पाण्डिचेरी और फ्रांस के कब्जे बाले भू-भाग उन्हें फिर वापस मिल गए।
भारत में ब्रिटिश उपनिवेश की स्थापना और विस्तार
पूर्वी भारत में अग्रेजों की सबसे पहली बस्ती 1633 में बसी थी। इस वर्ष उन्होंने उड़ीसा के हरिहरपुर और बालासोर में फैक्ट्रियों लगाई। बंगाल के मुगल वायसराय शाह सुजा की अनुमति से 1651 में हुगली में पहली इंगलिश फैक्ट्री लगी। शाह सुजा ने 3 हजार रूपये सालान के तय शुल्क वो बदले व्यापार की यह सुविधा दी थी Battle of Plassy।
जल्द ही उन्होंने कासिम बाजार, पटना तथा आस-पास के अन्य क्षेत्रों में फैक्ट्रियों लगाई। अंग्रेजों के व्यापार में मुख्य रूप से रेशम्, सूती वस्त्र, शोरा और चीनी शामिल था। 1651, 1656 और 1672 में जारी अनेक फरमानों के द्वारा अंग्रेजों को सीमा शुल्क से छूट दी गई और तय किया गया कि इसके बदले कम्पनी भारतीय प्रशासकों को एक निर्धारित धनराशि देगी।
1688 में अंग्रेजों ने 1200 रूपये देकर सुतानुती, कालीकट और गोविन्दपुर गांवों की जमीदारी हासिल कर ली। अंग्रेजों ने अपनी फैक्ट्री के आस-पास एक किले का निर्माण किया और इसे Fort William नाम दिया तथा सर Charles आयर को किले का पहला President नियुक्त किया। 1717 में मुगल बादशाह द्वारा जारी एक शाही फरमान के जरिए कम्पनी ने कई विशेष अधिकार हासिल कर लिए।
बादशाह फारूखसियार ने कम्पनी को बिना शुल्क अदा किए बंगाल में वस्तुओं के निर्यात और आयात की आजादी दी तथा बस्तुओं की मुक्त आवाजाही के लिए पास और दुस्तक जारी करने का अधिकार दिया। यह फरमान पत्र ईस्ट इण्डिया कम्पनी और बंगाल के नवाब के बीच विवाद का एक प्रमुख कारण बन गया Battle of Plassy।
कम्पनी के अधिकारियों द्वारा दुस्तक के दुरूपयोग पर मुर्शिद कुली खान और अलीवर्दी खान दोनों ने आपत्ति जताई, लेकिन कम्पनी ने उनकी नहीं सुनी। इसके चलते दोनों के बीच प्रतिरोध बढ़ गया Battle of Plassy।
सिराज-उद-दौला और ईस्ट इण्डिया कम्पनी
बंगाल की गद्दी पर सिराज-उद-दौला के बैठते ही शाही फरमान और दुस्तक के दुरुपयोग से जुड़ा विवाद और गम्भीर रूप लेने लगा। सिराज-उद-दौला शाही फरमान और पुस्तक के पुरुपयोग के सखा खिलाफ था साथ ही अंग्रेजों के इरादों पर शक करता था।
इस बीच यूरोप में ब्रिटेन और फ्रांस के राजनीतिक संबंध खराब होने लगे और अंग्रेजों ने यूरोप में एक और संघर्ष की तैयारी शुरू कर दी। यूरोप में इन ताकतों के बीच खींचातानी का प्रभाव भारत में इन दोनों कम्पनियों के संबंधों पर भी पड़ा। अंग्रेजों ने नवाब से अनुमति लिए बिना युद्ध की तैयारी के रूप में कलकता की मोर्चाबंदी शुरू कर दी।
नवाब ने दोनों पक्षों को इस मोर्चाबंदी को तत्काल रोकने का आदेश दिया। फ्रांसीसियों ने तो आदेश का पालन किया लेकिन अंग्रेजों ने आदेश मानने से इन्कार कर दिया Battle of Plassy।
सिराज-उद-दौला नौजवान और गुस्सैल था। वह इस अवज्ञा को सहन नहीं कर सका। उसने कासिम बाजार में ब्रिटिश कारखाने को जमा कर लिया और बाद में 20 जून, 1756 को फोर्ट विलियम पर कब्जा कर लिया Battle of Plassy।
इस दुस्साहस के दौरान एक तथा कथित भयानक घटना घटी। कहा जाता है कि 146 कैदियों को फोर्ट विलियम के एक छोटे से कमरे में कैद कर के रखा गया था। यह गर्मियों की घटना थी और वह रात इतनी गर्म थी कि उनमें से केवल 26 लोग ही जीवित बचे Battle of Plassy।
ब्रिटिश इतिहासकारों ने बंगाल के युवा नवाब को अत्यन्त क्रूर बताने के लिए इस घटना को अतिरंजित किया है। नवाब कालीकट को माणिकचन्द के हाथों में सौंप कर जीत का जश्न मनाने के लिए अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद चला गया। वहीं दूसरी तरफ, अंग्रेजों अपने जहाजों पर सवार होकर भाग निकले। नवाब की यह महान भूल थी, उसने अपने दुश्मनों की ताकत को कम करके आंका था।
इस बीच अंग्रेजों ने बचकर एक छोटे से द्वीप फुल्टा में शरण ली और मद्रास से सहायता का इंतजार करने लगे। कर्नल क्लाइव और एडमिरल वाटसन के नेतृत्व में क्रमशः सैनिक बल और नौसैनिक बल इनकी सहायता के लिए पहुंचा और इन्होंने हुगली की ओर कूच किया Battle of Plassy।
हुगली पहुँच कर इसे लूटा और 1757 की शुरुआत में कलकत्ता पर अंग्रेजों का फिर से कब्जा हो गया। 9 फरवरी, 1757 को नवाब को अलीनगर की संधि पर मजबूर होकर हस्ताक्षर करने पड़े। इस संधि में उसने कम्पनी की सभी मांगों को मान लिया। नवाब को कम्पनी के अधिकारों और रियायतों को बहाल करने और कम्पनी को हुए नुक्सान की भरपाई करने के लिए कहा गया।
प्लासी का युद्ध
अब अंग्रेजों ने सिराज-उद-दौला को पद से हटाने और उसकी जगह उनके इशारों पर चलने वाले व्यक्ति को गद्दी पर बैठाने का फैसला किया। उन्होंने मुर्शिदाबाद में नवाब की तरफ से कालीकट में नियुक्त प्रभारी माणिक चन्द एक धनाड्य व्यापारी अमीचन्द, जाने माने साहूकार, जगत सेठ, मीर जाफर, मीर बक्शी, नवाब के जनरल राय दुर्लभ के साथ पढ़यंत्र रचा और मीर जाफर को बंगाल की गद्दी पर बैठाने का निर्णय लिया।
23 जून 1757 ( ) को, दोनों सेनाएं मुर्शिदीबाद के निकट प्लासी के मैदान में एक-दूसरे के आमने-सामने थीं। मीर जाफर और राय दुर्लभ की अगुवाई में सेना का एक बड़ा भाग युद्ध में तटस्थ बना रहा और मीर मदान तथा मोहन लाल के नेतृत्व में मुट्टी भर सैनिकों ने अंग्रेजों का सामना किया। इस सेना की बुरी तरह हार हुई।
नवाब ने बचकर भाग निकलने की कोशिश की लेकिन वह पकड़ा गया और मारा गया। उसकी जगह मीर जाफर को बंगाल का नया नवाब घोषित किया गया Battle of Plassy।
के. एम. पनिक्कर का कहना है कि Plassy एक ऐसा बाजार बना, जहाँ Bengal के पैसे वाले बैंकरों और जाफर ने Nawab को अंग्रजों के हाथ बेच दिया। Plassy का युद्ध भारत का नियति नियन्ता साबित हुआ। कर्नल मैलेसन कहते है. कभी भी ऐसा युद्ध नहीं लड़ा गया, जिसके इतने व्यापक, इतने तात्कालिक और इतने स्थाई परिणाम निकले हो।
ईस्ट इंडिया कम्पनी का उदय
मीर जाफर ने 25 जून 1757 को मुर्शिदाबाद में प्रवेश किया। उसके राजधानी में आते ही क्लाइव ने उसे बंगाल, बिहार और उड़ीसा का सूबेदार नियुक्त कर दिया। वहीं दूसरी तरफ, Company ने 24 परगना की जमींदारी हासिल कर ली ( Battle of Plassy )।
कम्पनी ने कलकत्ता में एक टकसाल लगाई और बिहार में शोरे के व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया। साथ ही सूबे में कम्पनी के लिए मुक्त व्यापार का अधिकार प्राप्त कर लिया। Battle of Plassy इनके अलावा, कम्पनी ने जुलाई, 1757 की संधि से कई राजनीतिक रियायतें हासिल कर ली।
जल्दी ही मीर जाफर को अंग्रेजों के साहचर्य से चिढ़ होने लगी। उसने बंगाल से अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए ढची के साथ दुरभिसंधि की। क्लाइव ने उसके इस मनसूबे को भांप लिया और 1759 में डयों को पराजित किया। 1780 में क्लाइव के इंग्लैण्ड रवाना होने के साथ ही, जाफर के बुरे दिन शुरू हो गए, अंग्रेज उसे नापसंद करने लगे Battle of Plassy।
उसके पुत्र मीरन की मृत्यु होने पर नवाब और अंग्रेजों के रिश्तों में खटास पैदा हो गई। रॉबर्ट क्लाइव के उत्तराधिकारी लॉर्ड वैसीट्रैट ने अंततः नवाब को गद्दी से हटा दिया और उसकी जगह पर उसके दामाद मीर कासिम को बंगाल का नवाब बनाया।
मीर कासिम एक कुशल प्रशासक था और उसने मीर जाफर का कर्ज अदा किया। तत्कालीन इतिहासकार गुलाम हुसैन के अनुसार, वित्तीय मामलों में उसका कोई मुकाबला नहीं था। 1782 में, उसने मुर्शिदाबाद की जगह बिहार में मुगेर को अपनी राजधानी बनाया और वहां हथियारों की एक फैक्ट्री लगाई Battle of Plassy।
मीर कासिम ने कम्पनी के अधिकारियों द्वारा आंतरिक सीमा शुल्क से बचने के लिए फरमान के दुरुपयोग पर लगाम लगाई और आन्तरिक व्यापार पर सभी प्रकार के महसूलों को समाप्त करने की एक बड़ी पहल की। अन्ततः इस मुद्दे पर कम्पनी और मीर कासिम के बीच विवाद पैदा होना ही था Battle of Plassy।
बक्सर का युद्ध
अंग्रेजों की पटना स्थित फैक्टी के प्रमुख, एलिस ने मगर पर कब्जा करने की अपनी असफल कोशिश के द्वारा इस विवाद को हया दी। 1763 की गर्मियों भर मीर कासिम की सेनाओं के खिलाफ निरन्तर अभियान चला और एक के बाद एक हमलों में नवाब की पराजय हुई Battle of Plassy।
यह अवध भाग गया और वहाँ उसने अवध के नवाब सुजा-उद-दौला, मुगल बादशाह शाह आलम के साथ गठजोड़ किया। 22 अक्टूबर, 1764 को इन तीनों की संयुक्त सेना का बक्सर में अंग्रेजों से युद्ध हुआ। अंग्रेजी कमाण्डर मेजर हेक्टर मुनरों ने इस संयुक्त सेना को करारी शिकस्त दी। मुगल बादशाह शाह-आलम द्वितीय ने समर्पण कर दिया।
अवध पर कम्पनी का कब्जा हो गया और नवाब को रोहिल्लों के यहीं शरण लेनी पड़ी। तम्मान और आन बान के साथ शासन करने वाला नवाब मीर कासिम भगोठा बना और 1777 में चिल्ली में अत्यन्त गरीबी की हालत में उसकी मृत्यु हुई Battle of Plassy।
बक्सर के युद्ध का महत्व
बक्सर के युद्ध ने आधुनिक भारत के इतिहास को एक नई दिशा दी। यह घटना कई मायनों में प्लासी के युद्ध से ज्यादा महत्वपूर्ण थी। जेम्स स्टीफन के अनुसार, “भारत में ब्रिटिश सत्ता के उदय के नजरिए से बक्सर के युद्ध को प्लासी के युद्ध से ज्यादा श्रेय जाता है।
सैन्य नजरिए से, बक्सर अंग्रेजों के लिए एक महान विजय साबित हुआ। प्लासी में सिराज-उद-दौला की हार का मुख्य कारण उसके अपने जनरलों का छल-कपट था। बक्सर में अंग्रेज किसी ऐसे छल-कपट के बिना जीते थे। प्रो० ईश्वरी प्रसाद के शब्दों में “यह एक ऐसा युद्ध था जिसमें दोनों पक्ष पूरी शक्ति और उत्साह से लड़े और अहम मुद्दे तय हुए Battle of Plassy।
न केवल बंगाल के नवाब बल्कि बादशाह और उसके बंजीर को पराजय का मुख देखना पड़ा। उनकी प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा और देश में ब्रिटिश सेना की धाक जमी।” सुजा-उद-दौला जैसे अनुभवी युद्ध माहिर के खिलाफ विजय से कम्पनी की राजनीतिक प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई।
अब उत्तरी भारत में अंग्रेजों की ताकत अजेय हो गई थी। नया नवाब उनके हाथों की कठपुतली था. अवध का नवाब उनका स्वामिभक्त साथी और मुगल बादशाह उनका कैदी था Battle of Plassy।
दीवानी की शुरूआत लिए जिम्मेदार परिस्थितियाँ
क्लाइव दूसरी बार मई, 1765 में बंगाल का गवर्नर बनकर आया। उसने आते ही मुगल बादशाह और अवध के नवाब के साथ कम्पनी के रिश्तों को विनियमित करने पर ध्यान दिया।
इसी प्रकार, उसने बंगाल के नवाब, नाजिम-उद-दौला के साथ 12 अगस्त, 1765 को इलाहाबाद में एक संधि को अंजाम दिया, जिसके चलते अन्ततः कुख्यात दोहरी व्यवस्था जिसे दीवानी कहा जाता है, की शुरुआत हुई। इससे असल सत्ता कम्पनी के हाथों में चले गयी और प्रशासन का बोझ बंगाल के नवाब के कंधों पर पड़ा Battle of Plassy।
पहला एंग्लो-मैसूर युद्ध (1767-69)
प्रारम्भ में हैदरअली ब्रिटिश सत्ता को अपने प्रति शत्रुतापूर्ण मानता था। अंग्रेजों, मराठों और हैदराबाद के निजाम ने हैदरअली के खिलाफ त्रिपक्षीय गठबंधन तैयार किया। ( Battle of Plassy )लेकिन, हैदरअली ने राजनयिक पैतरा चलकर निजाम और मराठों को अपने साथ मिला लिया और इन तीनों ने मिलकर अरकॉट पर हमला किया।
अरकॉट का हैदरअली के साथ जमीनी विवाद था। लगभग डेढ़ साल तक चलने वाले इस उतार-चढ़ाव वाले संघर्ष के बाद हैदरअली ने अचानक मद्रास पर आक्रमण कर दिया। भयभीत मद्रास सरकार को 4 अप्रैल, 1769 को एक अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करने पड़े। इस संधि का आधार विजित भूमि की परस्पर वापसी और रक्षात्मक गठबंधन को बनाया गया था।
दूसरा एंग्लो-मैसूर युद्ध (1780-84)
इस दूसरे युद्ध का मुख्य कारण अंगेजों और हैदरअली के बीच आपास में अविश्वास बढ़ना था। मैसूर के शासक ने कम्पनी पर आरोप लगाया कि जब मराठों ने 1771 में मैसूर पर आक्रमण किया, कम्पनी ने 1769 की संधि की शर्तों का पालन नहीं किया। वहीं दूसरी तरफ हैदरअली ने अपनी सैन्य जरूरतों को पूरा करने में फ्रांसीसियों को ज्यादा मददगार पाया।
हैदरअली के संरक्षण में बसी फ्रांसीसी बरती पर अंग्रेजों के कब्जा करने के कारण, 1779 में हैदरअली, निजाम और मराठों ने परस्पर हाथ मिलाया। जुलाई, 1780 में हैदरअली ने कर्नाटक पर हमला किया और कर्नल बैली के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना को हरा कर अरर्कीट पर कब्जा कर लिया Battle of Plassy।
लेकिन, 1781 में पोर्ट नोवो में अंग्रेजों के हाथों उसे करारी हार मिली। 1782 में, हैदरअली ने कर्नल वैधवेट के नेतृत्व बाली अंग्रेजी सेना को एक बार फिर बुरी तरह से हराया। इस प्रकार, युद्ध में कभी हार और कभी जीत के सिलसिले के दौरान 1782 में हैदरअली की मौत हो गई और उसका अधिकांश अधूरा काम उसके पुत्र टीपू सुल्तान के जिम्मे आया Battle of Plassy।
चूंकि कोई भी पक्ष एक दूसरे को हराने में सक्षम नहीं था, अन्ततः एक दूसरे के जीते हुए भू-भाग को वापस लौटाने के आधार पर 1784 में मंगलौर में एक संधि पर हस्ताक्षर हुए और दोनों पक्षों के बीच शान्ति कायम हुई।
तीसरा एंग्लो-मैसूर युद्ध (1790-92)
इस युद्ध का कारण ट्रावनकोर पर आक्रमण था। यह एक छोटा सा राज्य था और इसका कम्पनी के साथ गठबंधन था। निजाम और मराठा सेना के सहयोग से अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान के खिलाफ युद्ध का एलान कर दिया Battle of Plassy।
1792 में, नए गवर्नर जरनल, लॉर्ड कार्नवाकिस के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने श्रीरंगपटम की ओर कूच किया और मैसूर की सेना को पराजित करके उन्हें एक संधि पर हस्ताक्षर के लिए मजबूर किया।
श्रीरंगपटम की इस संधि के फलस्वरूप टीपू सुल्तान को अपना लगभग आधा भू-भाग विजेता गठबंधन को सौपना पड़ा। अंग्रेजों को बढ़ामहल, डिन्डीगुल और मालाबार मिला, जबकि मराठों को तुंगमद्रा क्षेत्र में भू-भाग मिला और निजाम को कृष्णा से पेन्नार तक के क्षेत्र पर कब्जा मिला। मैसूर के पराजित शासक को तीन करोड़ रूपये से ज्यादा का युद्ध हरजाना भरने को भी कहा गया।
चौथा एंग्लो-मैसूर युद्ध (1799)
नया गवर्नर जरनल वेलेजली चाहता था कि टीपू सुल्तान फ्रांसीसियों से मित्रता छोड़कर अंग्रेजों के गठबंधन में शामिल हो। टीपू सुल्तान ने अफगानी जमान शाह को पत्र लिखकर पंजाब पर आक्रमण करने के लिए उकसाया था। इस वजह से भी अंग्रेज टीपू सुल्तान से नाराज थे। मराठा और निजाम अंग्रेजों का साथ दे रहे थे।
वेलेजली ने फरवरी 1799 में टीपू सुल्तान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। 4 मई 1799 को श्रीरंगपटम अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया। टीपू सुल्तान मारा गया और उसके पुत्र को आत्मसमर्पण करना पड़ा Battle of Plassy।
कम्पनी ने कनारा, कोयम्बटूर और श्रीरंगपटम तथा पूर्व के अन्य भू-भाग को अपने कब्जे में ले लिया तथा पुराने हिन्दू बोडियार राजवंश के प्रमुख को मैसूर का राजा बना दिया। हिन्दू शासक के अधीन नए मैसूर राज्य ने जुलाई 1799 में अंग्रेजों के साथ एक सहायक सधि पर हस्ताक्षर किए। जिससे इस राज्य की स्थिति कम्पनी पर निर्भर राज्य जैसी हो गई Battle of Plassy ।
अंग्रेज-मराठा युद्ध (एंग्लो-मराठा युद्ध)
पानीपत के तीसरे युद्ध (1761) से उत्तर में मराठों की सर्वोच्चता को गहरा धक्का लगा। पेशवा के चाचा, रघुनाथराव द्वारा पेशव पद हड़पने के लिए रखे षडयंत्र से स्थिति और भी खराब हो गई। 1761 में माधवराव पेशवा बने और उन्होंने सारी दिक्कतों पर विजय पाई Battle of Plassy।
पहला एंग्लो-मराठा युद्ध (1775-82)
मरादों की आन्तरिक नाराजगी और अंग्रेजों की दिन प्रतिदिन बढ़ती महत्वाकांक्षा
पहले एंग्लो-मराठा युद्ध के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार थीं। 1772 में युवा पेशवा माधव राय की मृत्यु हो गई। इसके बाद उत्तराधिकार के लिए एक के बाद एक संघर्ष हुए। माधवराव के चाचा रघुनाथ राव ने साजिश रच कर 1773 में माधवराव के भाई एवं उत्तराधिकारी नारायण राव की हत्या कर दी।
हालांकि रघुनाथ राव पेशवा बन गया, लेकिन नारायण राव के मृत्योपरान्त पुत्र पैदा होने से, जिसका नाम सवाई माधणराव था. उसे अपनी पेशवाई पर खतरा नजर आने लगा। वह इस हद तक हताश हो गया कि उसने अंग्रेजों की सैन्य टुकड़ी की मदद से अपने पद को सुरक्षित बनाने के लिए बॉम्बे सरकार के साथ सूरत की संधि (1775) पर हस्ताक्षर कर दिए Battle of Plassy।
इस दौरान, अंग्रेज महाद जी सिंधिया को पेशवाई विवाद से अलग करने में सफल रहे और उसकी मध्यस्थता से यह संघि सम्पन्न हुई। इस संधि के द्वारा रघुनाथ राव ने सालसेते और बसाइन पर अपना अधिकार त्यागने और कम्पनी के शत्रुओं के साथ कोई भी गठबंधन न करने का बायदा किया Battle of Plassy।
इसके बाद हुए युद्ध में हार-जीत का सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक कि दोनों पक्षों को युद्ध की निरर्थकता समझ नहीं आई और सलबल की संधि (1782) के रूप में इस युद्ध का अन्त हुआ। सलबल की संधि से अंग्रेजों और मराठों के बीच बीस वर्ष तक शान्ति रही Battle of Plassy।
दूसरा एंग्लो-मराठा युद्ध
दो बृद्धिमान प्रशासको महाद जी सिंथिया (1794) और नाना फड़नवीस (1800) की मृत्यु से मराठा शक्ति में जो शून्य पैदा हुआ था उसे भरना मुश्किल था। महाद जी सिंधिया के उत्तराधिकारी दौलत राय सिंधिया तथा जसवन्त राय छोल्कर के बीच सत्ता के लिए जबर्दस्त प्रतिद्वदिता थी, दोनों ही पूना के प्रशासन पर अपनी पकड़ चाहते थे Battle of Plassy।
1802 में, होल्कर दौलतराव और पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेनाओं को पूना के निकट डराने में कामयाब रहा। पेशवा बाजीराव द्वितीय भागकर बसाइन चला गया और वहाँ उसने 31 दिसम्बर, 1802 को अंग्रेजों के साथ एक सहायक संधि की। यह मराठा गौरव पर एक गहरा आघात था। 1803 में, सिंथिया और भोंसले का अंग्रेजों से युद्ध हुआ Battle of Plassy।
उन्हें आर्थर बेलेजली और लॉर्ड लेक के हाथों पराजय का सामना करना पड़ा देवगांव की संधि (17) दिसम्बर 1803) के द्वारा भोंसले ने बालासोर और कटक प्रान्त पर अपना अधिकार छोड दिया तथा सिंधिया ने सुरजी अर्जन गांव की संधि (30 दिसम्बर, 1803) के द्वारा कम्पनी को गंगा-यमुना दोआब का क्षेत्र और साथ ही अहमदनगर, भड़ौच सौंप दिया तथा मुगल साम्राज्य पर अपने सारे दावे त्याग दिए।
निजाम, गायकवाड और पेशवा ने 1804 में बुरहानपुर की एक और संधि के द्वारा तथा सिंथिया ने लॉर्डशिप के बारे में सहायक गठबंधन पर सहमति दे दी। लेकिन, 1804 में होल्कर को कम्पनी के साथ एक और संघर्ष में उलझना पड़ा और नवम्बर 1804 में फ्रेजर और लेक के हाथों शिकस्त झेलनी पड़ी Battle of Plassy।
जसवंत राय होल्कर की पराजय के बाद राजपुर घाट की संधि (25 दिसम्बर 1805) हुई। इस संधि के द्वारा मराठा सरदार चम्बल के उत्तर में स्थित स्थानों, बुन्देलखण्ड, पेशवा तथा कम्पनी के अन्य साथियों पर अपने दावों को त्यागना पड़ा। इस संधि के साथदूसरा एंग्लो-मराठा युद्ध समाप्त हो गया Battle of Plassy।
तीसरा एंग्लो-मराठा युद्ध (1817-18)
दूसरे एंग्लो-मराठा युद्ध ने मराठा सरदारों की राजनीतिक सत्ता को चकनाचूर कर दिया। लेकिन वे अभी भी सक्रिय थे और वे अपनी खोई हुई आजादी पुनः हासिल करने के घोर प्रयास कर रहे थे। पेशवा अंग्रेजों के सख्त नियंत्रण में तिलमिला रहा था और उसने ही अपनी खोई सत्ता पाने की दिशा में सबसे पहले कदम उठाया।
पूना के अंग्रेज रेजीडेन्ट, एलफिन्स्टन ने पेशवा को 13 जून, 1817 को एक नई संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया। इस संधि के द्वारा, पेशवा ने इस पद के रूप में अपना दावा त्याग दिया और साथ ही मराठा संघ की सरदारी भी उसे छोड़नी पड़ी। वहीं दूसरी तरफ, लॉर्ड हेस्टिंग्स ने दौलत राव सिंधिया को भी 5 नवम्बर, 1817 को ग्वालियर की सधि के लिए मजबूर किया।
पेशवा बाजीराव द्वितीय ने हताश होकर ब्रिटिश दुरभिसंधि से छुटकारा पाने के लिए अन्तिम प्रयास किया और पूना के समीप किर्की में अंग्रेजों पर अक्रमण कर दिया। दौलत राव सिंधिया, नागपुर के अम्पा राव और मल्हार राव होल्कर ने भी अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठा लिए। पेशया को किर्की में और इसी तरह उपरोका तीनों को पराजय का सामना करना पड़ा।
पेशवा की सेना की अंतिम पराजय अष्टि में हुई और उसने, 2 जून, 1818 को समर्पण कर दिया।इस प्रकार ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ मराठों का संघर्ष पूरी तरह समाप्त हो गया तथा मराठा सरदारों के साथ एक नया बन्दोबस्त किया गया Battle of Plassy।
पेशवा ने अपना पदनाम और अधिकार हमेशा के लिए त्याग दिए और इसके बदले उसे पेंशन के रूप में 8 लाख रूपये मंजूर किए गए तथा शेष जीवन बिताने के लिए कानपुर के पास बिद्र जाने के लिए मजबूर किया गया। तथापि, सतारा के राजाओं के रूप में शिवाजी के वंशजों के22लिए सतारा के निकट एक छोटा सा जिला छोड दिया गया Battle of Plassy।
पेशवा के राज्य का शेषसारा भाग बॉम्बे प्रेसीडेंसी में मिला दिया गया।
2.8 अंग्रेज-सिख युद्ध (एंग्लो-सिख युद्ध)सिखों को 18वीं सदी के मध्य में प्राधान्यता मिली। मुगलों और अफगानों के खिलाफ संघर्ष के दौरान, ये विशेष प्रकार के दस्तों के रूप में संगठित थे, जिन्हें मिस्ल कहा जाता था और मिस्ल के सरदार को मिस्लदार कहा जाता था।
इन मिस्लों की संख्या बाद के वर्षों में बढ़ती चली गई और इन्होंने पंजाब के एक बहुत बड़े हिस्से को आपस में बांट लिया। रणजीत सिंह का जन्म 1780 में हुआ था। सुकेरचकिया मिरल के सरदार के रूप में, रणजीत सिंह ने सभी मिस्लों को एकजुट करके एक सिख राज्य की स्थापना की Battle of Plassy।
इन्होंने 25 अप्रैल, 2007 को अमृतसर में अंग्रेजों के साथ एक चिरस्थायी संधि की और सतलुज को अंग्रेजों के संरक्षण में दे दिया तथा अंग्रेजों की सीमा को जमुना से सतलुज तक फैला दिया ( Battle of Plassy ) ।
पहला एंग्लो-सिख युद्ध (1845-48)
जून, 1839 में रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद, सिख साम्राज्य में अस्तव्यस्तत्ता और अराजकता फैल गई। सेना राजनीतिक फैसले लेने लगी। लेकिन हालात नहीं बदले, इस बीच, रणजीत सिंह के सबसे छोटे पुत्र, दिलीप सिंह जो कि अवयस्क था के सितम्बर 1843 में गद्दी पर बैठने और उसकी माता रानी जिंदां के प्रतिशासक रानी के तौर पर राजकाज सम्भालने तक दो शासकों की हिंसा में हत्या हो चुकी थी।
लेकिन, हालात सुधरने के बजाय दिन प्रतिदिन बिगड़ते चले गए।लाहौर दरबार सेना के नियंत्रण से छुटकारा पाना चाहता था। इसलिए उसने इस उम्मीद में सेना को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिये उकसाया कि इससे सेना की ताकत कम हो जाएगी। दिसम्बर, 1845 में सिख सेना ने सतलुज पार करके अंग्रेजों की जमीन पर आक्रमण किया Battle of Plassy।
एक के बाद एक मुठभेड़ में सिखा सेना की हार हुई और 20 फरवरी 1846 को अंग्रेजों ने लाहौर पर कब्जा कर लिया। इस पराजय के बाद 9 मार्च, 1846 को लाहौर की संधि हुई। इस संधि के द्वारा सिखों को, जलंधर दोआब, काश्मीर और इसके अश्रित प्रदेश अंग्रेजों को देने पड़े Battle of Plassy।
अवयस्क दिलीप सिंह को महाराजा के रूप में मान्यता दी गई और लाहौर में एक रेजीडेंट नियुक्त कर दिया गया। 16 दिसम्बर 1846 को एक अनुपूरक सधि पर हस्ताक्षर हुए। जिसके अनुसार, राजकाज चलाने के लिए 8 सरदारों की एक प्रतिशासक परिषद बनाने का प्रावधान किया गया, जिसका प्रमुख ब्रिटिश रेजीडेंट सर हैनरी लारेंस बनाया गया।
दूसरा एंग्लो-सिख युद्ध (1848-49)
यह व्यवस्था ज्यादा समय तक नहीं टिकी और 1848 में, मुल्तान के गवर्नर, दीवान मुल्कराज ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। सितम्बर तक सिखों की एक बडी सेना के मुल्कराज के साथ मिल जाने से हालात और गम्भीर हो गए Battle of Plassy।
छोटा सा विद्रोह अब एक बड़ा आकार ले चुका था और इसकी गम्भीरता को समझते हुए, डलहौजी ने युद्ध की घोषणा कर दी। रामनगर (16 नवम्बर, 1848) और चिलिजनवाला (13 जनवरी, 1849) की लडाई, 29 मार्च, 1849 को गुजरात (चेनाब के नजदीक एक कस्बा) जी निर्णायक लड़ाई में तब्दील हो गई।
डलहौजी ने एक घोषणा पत्र द्वारा पूरे पंजाब को हड़प लिया और महाराजा दिलीप सिंह को पेंशन भोगी बनाकर उसकी माता रानी जिंदां के साथ इंग्लैण्ड भेज दिया। पंजाब का प्रशासन एक बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को सौंप दिया गया। इस बोर्ड को भी 1853 में भंग कर दिया गया और इसके स्थान पर जॉन लारेंस को पंजाब का चीफ कमिश्नर बना दिया गया Battle of Plassy।
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